Tuesday, 16 April 2019

पांडा की दोस्ती

एक बार की बात हैं। किसी बर्फीले पहाड़ की चोटी पर ध्रुवीय भालू रहते थे। उसी पहाड़ पर नीचे की तरफ बहुत सारे पांडा भी रहते थे।बहुत दूर-दूर रहने की वजह से पांडा और ध्रुवीय भालू का कभी आमना-सामना नहीं हुआ था । एक दिन एक बच्चा पांडा अपनी माँ से पूछता हैं। माँ ! हम कभी पहाड़ के ऊपर की तरफ क्यों नहीं जाते ? पांडा की माँ अपने बच्चे से कहती है क्योंकि, ऊपर की तरफ ध्रुवीय भालू रहते हैं। मैंने सुना है की वह बहुत खतरनाक होते हैं। इसीलिए हम कभी पहाड़ के उस तरफ नहीं जाते और न ही वह कभी नीचे की तरफ आते हैं। पांडा अपनी  माँ से पूछता है, आप उनसे मिली हो ? नहीं बेटा ! मैं उनसे कभी नहीं मिली। ऐसा पांडा की माँ उससे कहती है चलो अब तुम अपने दोस्तों के साथ खेलों और मुझे आराम करने दो।
इसके बाद वह बच्चा पांडा वहा से चला जाता है।एक तरफ जहाँ पांडा, ध्रुवीय भालू के बारे में पूछता है, वही दूसरी तरफ एक ध्रुवीय भालू का बच्चा भी अपने पापा से पूछता हैं।

भालू का  बच्चा  पापा ! हम हमेशा इस चोटी पर ही क्यों रहते हैं ? कभी नीचे की तरफ क्यों नहीं जाते ? भालू के पापा कहते है  क्योंकि, पहाड़ की नीचे की तरफ पांडा रहते हैं और मैंने सुना है की पांडा सिर्फ अपनों के साथ ही प्यार से रहते हैं। इसीलिए हम कभी नीचे की तरफ नहीं जाते और न ही कभी वह ऊपर की तरफ आते हैं।

भालू आपस में बात कर ही रहे होते है की तभी पहाड़ की चोटी पर भूस्खलन होता हैं।जिसकी आवाज़ पांडा तक भी पहुँचती हैं, लेकिन उसका असर सिर्फ ध्रुवीय भालुओं पर ही होता हैं।आवाज़ सुनकर सभी पांडा डर जाते है और एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं।

पांडा डरते हुए कहता है  यह डरावनी आवाज़ कैसी थी ?  जरूर पहाड़ की चोटी की तरफ भूस्खलन हुआ हैं। वहां तो ध्रुवीय भालू रहते हैं।वह सब ठीक तो होंगे न ? पांडा की माँ उसे कहती  है  वो हमें नहीं पता ! चलो सभी वापस अपने-अपने घर चलते हैं।

अगली सुबह बच्चा पांडा अपने दोस्तों के साथ खेलने के लिए घर से बाहर निकलता हैं ।थोड़ी दूर पहुंचने पर उसे एक जगह बहुत सारी मिट्टी पड़ी हुए नज़र आती हैं।

पांडा अपने मन में सोचता है यह मिट्टी का ढेर कल तक तो यहाँ नहीं था। अचानक इतने बड़े मिट्टी के ढेर को वहां देख पांडा असमंजस में पड़ जाता हैं। वह उस ढेर को देख ही रहा होता है की तभी उसके अंदर से एक पांडा बाहर निकलता हैं। पांडा चौंकते हुए दूसरे पांडा से कहता है  अरे ! तुम इस मिट्टी के ढेर में क्या कर रहे थे ? पांडा यह पांडा हमारे पहाड़ का तो नहीं लगता। इसका रंग भी हमसे कुछ अलग हैं। फिर वो उस पांडा से पूछता है  दोस्त तुम कहाँ से आये हो ? बताओ दोस्त ! तुम कौन हो ?  बच्चा भालू मन में सोचते हुए  लगता है, मेरे ऊपर मिट्टी लगने की वजह से यह लोग मुझे पहचान नहीं पाए और मुझे भी एक पांडा समझ रहे हैं। भालू का बच्चा  मैं कल रात ही इस पहाड़ पर नया आया हूँ। क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगे ?




सभी बच्चें उससे दोस्ती करने के लिए हाँ बोल देते हैं और अब बच्चा भालू, पांडा के साथ रहने लगता हैं।


पांडा की माँ बच्चा भालू से पूछती है  बेटा ! तुम कौन से पहाड़ से आये हो ? भालू का बच्चा मैं यहाँ से थोड़ी दूर एक पहाड़ पर रहता हूँ।एक दिन परिवार के साथ घूमते हुए मैं गुम हो गया और भटकते हुए यहाँ पहुंच गया। पांडा का बच्चा अपनी  माँ से कहता है, आज से यह हमारे साथ ही रहेगा। भालू का बच्चा मन में सोचते हुए कहता है, यह पांडा कितने अच्छे है। लेकिन अभी भी यह मेरे साथ प्यार से इसीलिए रह रहे है क्योंकि मैं इन्हे एक पांडा लग रहा हूँ। पांडा भालू के साथ खेलता है और बाकी दोस्तों को भी साथ ले चलता है और कहता है  चलो दोस्त, हम सब मिलकर बाहर खेलने चलते हैं।

भालू ख़ुशी-ख़ुशी पांडा के साथ रहने लगता हैं।इसी तरह दिन बीतते जाते हैं।एक दिन सभी पांडा खेलने के लिए पहाड़ पर बह रही नहर के पास जाते हैं।भालू जब वहां पहुँचता है तो पानी देखकर घबरा जाता हैं। भालू का बच्चा मन में सोचते हुए  अगर यह पानी मुझपर गिर गया तो मेरी असलियत सबके सामने आ जाएगी। मुझे किसी भी तरह पानी से दूर रहना होगा।

भालू खुद को पानी से बचाने की बहुत कोशिश करता है, लेकिन खेलते-खेलते भालू को धक्का लगता है और वह पानी में गिर जाता है। जिसकी वजह से उसके ऊपर लगी मिट्टी हट जाती हैं। भालू को ऐसे देख सभी पांडा हैरान रह जाते हैं। पांडा हैरान होकर कहता है  तुम तो एक ध्रुवीय भालू हो। यह बहुत खतरनाक है।हमें जल्दी घर वापस चलना चाहिए।

सभी भागते हुए अपने घर वापस आ जाते हैं।उनके पीछे-पीछे भालू भी वहां आ जाता हैं।जिसे देखकर मादा पांडा बोलती हैं। पांडा की माँ भालू को देखकर कहती है  यह ध्रुवीय भालू यहाँ कैसे आया ? माँ, ये वही पांडा है। जो पिछले कुछ दिनों से हमारे साथ रह रहा था। ऐसा पांडा ने अपनी माँ से कहा।  भालू का बच्चा कहता है  आप सभी कृपया करके एक बार मेरी बात सुन लीजिये।मैं यहाँ किसी को नुकसान पहुंचाने नहीं आया हूँ। पांडा की माँ उससे पूछती है तो फिर तुम यहाँ क्यों आये हो ?

भालू का बच्चा उन्हें समझता है,  कुछ दिनों पहले पहाड़ की चोटी पर भूस्खलन हुआ था। जिसकी वजह से मैं पहाड़ के टूटे हुए टुकड़े के साथ नीचे गिर गया और यहाँ पहुंच गया।मेरे शरीर पर मिट्टी लगे होने की वजह से आप सभी ने मुझे भी पांडा समझ लिया और मेरे साथ प्यार से रहने लगे।मुझे वापस जाने का रास्ता भी नहीं पता था, इसीलिए मैं यहाँ रुक गया।  लेकिन तुमने हम सभी से झूठ बोला ! ऐसा पांडा की माँ भालू के बच्चे से कहती है। भालू  का बच्चा पांडा की माँ से माफ़ी मांगता है और कहता है उसके लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। तुम बहुत दिनों से हमारे साथ रह रहे हो ! इसीलिए मैं यह बोल सकती हूँ की तुम बहुत अच्छे हो। और हम सभी को तुमसे कोई दिक्कत नहीं हैं। भालू का बच्चा उनसे कहता है  मैंने सुना था की पांडा सिर्फ अपनों के साथ ही प्यार से रहते हैं, लेकिन आज आप सभी का व्यवहार ने इस बात बिलकुल गलत साबित कर दिया। हमने भी हमेशा यह ही सुना था की ध्रुवीय भालू बहुत खतरनाक होते हैं।लेकिन तुम बिल्कुल भी वैसे नहीं हो, हमें तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।

पांडा और भालू बातें कर ही रहे होते है, तभी भालू के पापा उसे ढूंढ़ते हुए वहां आ जाते हैं।अपने पापा को देखकर भालू बहुत खुश होता है और भागकर उनके पास जाता हैं। भालू के पापा उससे कहते है,  बेटा ! तुम ठीक हो ? मुझे तो लगा था की शायद मैं दोबारा तुमसे कभी नहीं मिल पाउँगा। पापा, आज मैं इन सभी पांडा की वजह से ही ज़िंदा हूँ ! अगर यह लोग मुझे अपने साथ रहने नहीं देते तो शायद ज़िंदा नहीं रहता। ऐसे भालू ने कहा भालू के पापा आपने मेरे बेटे की जान बचाई उसके लिए आप सभी का बहुत धन्यवाद।
इसके बाद सभी पांडा और भालू साथ मिलकर बहुत बातें करते हैं और कुछ देर बाद भालू अपने बेटे को लेकर वहां से वापस पहाड़ चोटी की तरफ चला जाता हैं।जिसके बाद पांडा और ध्रुवीय भालू हमेशा अच्छे दोस्त बनकर रहने लगते है।

शिक्षा :- हमें कभी किसी को जाने बिना उसके बारे में कोई राय नहीं बनानी चाहिए और हमेशा सभी के साथ मिलकर रहना चाहिए।  

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Thursday, 11 April 2019

अर्जुन और शाकाल

हिमाचल प्रदेश में एक बहुत घना जंगल था। उस जंगल में एक बहुत बड़ी गुफा थी, जिसमे सीताराम नाम के एक साधु काफी समय से साधना कर रहे थे। सीताराम बहुत ज्ञानी और समझदार साधु थे। वह कभी किसी कि सहायता करने से पीछे नहीं हटते थे। वह जंगल के जानवरों की भी बहुत देखभाल करते थे। एक दिन पास के गाँव में रहने वाले आदित्य, अर्जुन, नेहा और भास्कर नाम के चार बच्चे जंगल में घूमने के लिए आये।

आदित्य बोला यह जंगल कितना घना है। नेहा बोली यह जंगल घना ही नहीं बहुत डरावना भी है । हाँ, तुम दोनों ठीक बोल रहे हो, देख कर ऐसा लगता है अर्जुन बोला। यहाँ कभी भी किसी लकड़हारे की नज़र नहीं पड़ी। वरना गाँव के तो सभी पेड़ों को लोग धुएं में उड़ा चुके हैं ।”

सभी बच्चे जंगल में बहुत दूर तक चले जाते हैं । चलते-चलते नेहा कि नज़र एक गुफा पर पड़ती है। “अरे देखो ! शायद वहाँ कोई गुफा है । ज़रूर उसमें कोई भयंकर जानवर रहता होगा । भास्कर ने कहा तुम भी बहुत भोली हो - अगर इस जंगल में कोई जानवर होता, तो वह अभी तक हमे खा नहीं लेता ! मुझे लगता है, उस गुफा में कोई नहीं रहता । हमे वहाँ जाकर कुछ देर आराम करना चाहिए ।”

आदित्य की बात सुनकर सभी बच्चे गुफा की तरफ बढ़ते हैं। जैसे ही वह गुफा के पास पहुंचते हैं, उन्हें सीताराम साधु मिलते हैं। बच्चों को जंगल में देखकर सीताराम हैरान रह जाते हैं । सीताराम बच्चो से कहते है  तुम सब कौन हो ? और इस जंगल में क्या कर रहे हो ?

उन बच्चो में से एक बच्चा अर्जुन बोलता प्रणाम महाराज ! हम पास के गाँव में रहते हैं और जंगल में घूमने आये हैं।
तो सीता राम गुस्से में कहता है  क्या तुम नहीं जानते कि यह जंगल कितना खतरनाक है?! तुम सबको यहां नहीं आना चाहिए था।


तभी भास्कर बोला !   खतरनाक..... पर हमे तो यह जंगल बिलकुल खतरनाक नहीं लग रहा। हाँ, अभी तक पूरे जंगल में हमे कोई जानवर भी नहीं दिखा । लगता है, जंगल में सिर्फ आप ही रहते हैं। सीताराम  कहते है नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है। इस जंगल में बहुत से खतरनाक जानवर रहते हैं, पर आज अमावस्या है, इसलिए सभी जानवर अपने-अपने घर में छुप गए हैं। सीताराम आस पास देखता है और बच्चो से कहता है चलो बच्चों, इससे पहले की शाकाल यहाँ आ जाये, जल्दी से गुफा के अंदर चलो।

यह सब देखकर बच्चे बहुत डर जाते हैं और साधु के साथ गुफा के अंदर चले जाते हैं। अर्जुन कहता है पर महाराज, यह अचानक हंसने की आवाज कहाँ से आ रही थी ? और यह शाकाल कौन है ? सीताराम  शाकाल एक राक्षस है, जो हर पच्चास साल में अमावस्या के दिन इस जंगल में आता है और जानवरों को खा जाता है। इसका मतलब शाकाल के डर की वजह से सभी जानवर छुप गए हैं। शायद तभी हमे इस जंगल में कोई जानवर नहीं दिखा।

सीताराम  तुमने बिलकुल सही समझा। शाकाल को जानवरों और इंसानों के बच्चों को खाना बहुत अच्छा लगता है तभी नेहा कहती है क्या…. इसका मतलब वो हमें भी खा जायेगा। मुझे बहुत डर लग रहा है। हमे इस जंगल में आना ही नहीं चाहिए था। साधु ने कहा नहीं-नहीं। तुम सबको डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। शाकाल तुम्हारा इस गुफा में कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

अर्जुन  मुझे इस शाकाल को देखना है, आखिर पता तो चले कि यह राक्षस दिखता कैसा है ? नहीं, वो बहुत खतरनाक है। वो तुम्हें नुक्सान भी पहुंचा सकता है। पर मैं उसे गुफा के अंदर से ही देखूँगा, जिससे वह मुझे देख ना सके अर्जुन ने ये साधु बाबा से कहा। मैं तुम्हें बाहर जाने की आज्ञा नहीं दे सकता।

साधु के बार-बार मना करने पर भी अर्जुन नहीं मानता और शाकाल को देखने के लिए चला जाता है। वह शाकाल को देखकर बहुत डर जाता है। वह देखता है, की एक चार हाथों वाला विशाल राक्षस पेड़-पौधों को तोड़ते हुए चला आ रहा है और साथ ही जंगली जानवरों को भी बहुत नुक्सान पहुंचा रहा है। यह देखकर अर्जुन जल्दी से गुफा के अंदर वापस जाता है। महाराज, ये शाकाल तो बहुत भयंकर है। इस तरह तो वह जंगल का विनाश कर देगा। क्या इसको भगाने का कोई उपाय नहीं है ?
सीताराम अर्जुन से कहते है नहीं, इससे  भगाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि वह एक राक्षस है। इसको भगाना हम इंसानों के बस की बात नहीं है।

भास्कर  पर महाराज  इसे यहाँ से भगाने का कोई तो रास्ता होगा ? सीताराम  हाँ में सिर हिलाकर कहता है हां एक उपाय है। यदि हम किसी तरह इस राक्षस को गुफा के अंदर ले आएं तो शायद हमें उससे छुटकारा मिल सकता है। नेहा कहती है पर  महाराज, इस गुफा में ऐसा क्या है!? सीताराम बताता है  इस गुफा में दिव्य शक्तियां हैं, जैसे ही राक्षस इनके पास आएगा वह भस्म हो जायेगा।

अर्जुन अगर ऐसी बात है, तो मैं अभी इस राक्षस को गुफा के अंदर ले आता हूँ।आदित्य अर्जुन से पूछता है लेकिन तुम ये सब करोगे कैसे ? अर्जुन यह सब तुम मुझपर छोड़ दो। ऐसा कहकर अर्जुन गुफा के बाहर चला जाता है और शाकाल के सामने जाकर खड़ा हो जाता है। शाकाल अर्जुन को देखक्र ख़ुशी से कहता है अरे वाह ! इंसानी बच्चा...... इसे खाने में तो बड़ा मज़ा आएगा। अर्जुन  तुम कौन हो और यहाँ क्यों आये हो ?

शाकाल  मैं हूँ शाकाल, पर किसी के बस में नहीं मेरा काल। खाने में पसंद हैं मुझे बच्चे, क्योंकि वह होते हैं मन के सच्चे। अच्छा, अगर ऐसी बात है, तो तुम मुझे खा सकते हो, पर पहले मैं आखिरी बार अपने दोस्तों से मिलना चाहता हूँ। क्या, दोस्त ? इसका मतलब यहाँ तुम्हारे अलावा और भी बच्चे हैं ? हाँ, वो यहीं सामने वाली गुफा में हैं। शाकाल कहता है तो चलो देरी किस बात की, मुझे जल्दी वहाँ ले चलो। मैं बहुत दिनों से भूखा हूँ।

अर्जुन ठीक है, तुम मेरे पीछे-पीछे आ जाओ और गुफा में आराम से बैठ कर सारे बच्चों को खा लो। ऐसा कहकर अर्जुन गुफा के अंदर जाने लगता है और शाकाल भी उसके पीछे-पीछे गुफा में जाने लगता है। जैसे ही शाकाल गुफा में प्रवेश करता है, दिव्य शक्तियों के प्रभाव से वह उसी समय भस्म हो जाता है। इस तरह अर्जुन, शाकाल का अंत करता है। साधु महाराज, अर्जुन की प्रशंसा करते हैं और सभी बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर वापस चले जाते हैं।

शिक्षा :-  हमें यह शिक्षा मिलती है कि हम अपनी सूझ - बूझ से किसी भी परेशानी का हल निकाल सकते हैं।

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Monday, 8 April 2019

जिन्न और ऊंट

किसी जंगल में बहुत सारे जानवर रहते थे। सभी जानवर जंगल को साफ़ रखते थे और अपने-अपने काम को समय पर करते थे। उसी जंगल में एक शक्तिशाली जिन्न भी रहता था। जंगल के सभी जानवर बहुत चुस्त थे, पर ऊंट बहुत आलसी था। ऊंट जंगल के किसी भी काम को नहीं करता था। सभी जानवर ऊंट से बहुत परेशान थे। एक दिन शेर ने एक सभा का आयोजन किया। सभी जानवर वहाँ इकठ्ठा हुए। 

मैने तुम सबको यहाँ एक खास वजह से बुलाया है ऐसा शेर ने कहा, सभी जानवर शेर से पूछने लगे कैसी वजह महाराज ? तो शेर ने कहा  यह जंगल हमारा घर है। इसलिए आज से हम सभी जानवर जंगल के सारे काम मिलजुल कर करेंगे। उन्हें यह बात अच्छी लगी और उन्होंने अपने-अपने काम आपस में बाँट लिया।  

घोडा कहने लगा  हम सबने तो अपने-अपने काम बाँट लिए पर ऊंट को तो कोई काम मिला ही नहीं। इस पर ऊंट ने कहा  मैं जंगल के सभी कामों को करने में तुम सबकी सहायता करूँगा। घोड़े को ये बात ठीक लगी ! तुम जंगल के सभी जानवरों की सहायता करना। 

सभी जानवरों अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए। यह देख कर ऊंट एक घने पेड़ के नीचे बैठ गया । जब कोई जानवर उसे काम के लिए बोलता, तो वह काम करने से मना कर देता। बहुत दिन बीत जाने पर भी ऊंट ने किसी काम को करने में अपनी दिलचस्पी नहीं दिखाई । 

घोडा ऊंट से कहने लगा भाई ज़रा इस तालाब को साफ़ करने में मेरी सहायता कर दो। अरे ! यह काम तो तुम्हारा है। फिर मैं इसमें तुम्हारी सहायता क्यों करूँ ? यह कहते हुए ऊंट वहाँ से चला गया। रास्ते में उसे गधा मिला। गधा ऊंट से कहता है  भाई ! ज़रा इस बोझ को जंगल तक पहुंचाने में मेरी सहायता कर दो। नहीं नहीं, अगर मैं इतना बोझ उठाऊंगा, तो तुम्हारी तरह गधा नहीं बन जाऊंगा। 

  

गधे को ऊंट की यह बात बुरी लगी और उसने अकेले ही सारा बोझ जंगल तक पहुंचाया। ऊंट जंगल के बाहर जाने वाले रस्ते पर सो गया। तभी वहाँ जैकु कुत्ता आया। अरे ऊंट भाई उठो ! यह सोने का समय है क्या ? चलो मेरे साथ जंगल की देखभाल करो ।

इस पर ऊंट जैकु भाई, मैं बहुत थक गया हूँ। इसलिए मुझे थोड़ी देर सोने दो। थक गए हो ! पर तुम तो सारा दिन सोते ही रहते हो, फिर थक कैसे गए ? ऊंट को जैकु की बात बुरी लगी और वह मुँह बना कर वहाँ से चला गया । सभी जानवर ऊंट से परेशान हो गए थे । वह सभी दुखी हो कर जंगल के जिन्न के पास गए । जिन्न ने सबको एक साथ अपने पास देखकर कहा…  

अरे तुम सब एक साथ यहाँ ! सब ठीक तो है ? सभी जानवर कहने लगे सब ठीक है जिन्न भाई , बस हम सब तो ऊंट से परेशान हैं। 

जिन्न ने उनसे पूछा ऐसा क्या हुआ ? सभी जानवरों ने जिन्न को पूरी बात बताई और उससे निवेदन किया कि वह ऊंट को ऐसी सजा दे जिससे, उसे अपने आलस का एहसास हो जाये। अगर ऐसी बात है, तो मैं कोई तरकीब सोचता हूँ। 

कुछ देर बाद जिन्न को एक तरकीब सूझी, उसने अपने जादू से ऊंट की पीठ पर एक कूबड़ बना दिया । अगली सुबह जब ऊंट जंगल में घूमने आया तो सभी जानवरों ने उसका मज़ाक बनाते हुए कहा… । 

सभी जानवर ऊंट से कहते है,  भाई कल रात को कहीं पिटाई हुई है क्या ?  नहीं तो, ऐसा तो कुछ नहीं हुआ, फिर तुम सब ऐसे क्यों बोल रहे हो ? तभी शेर भी वहाँ आया और उसने ऊंट से पूछा । 

शेर कहता है  अरे ऊंट भाई तुम्हारी पीठ पर यह भदा सा कूबड़ कहाँ से आया, पहले तो इसे कभी नहीं देखा। ऊंट ने मुड़ के अपनी पीठ की तरफ देखा। वह बहुत दुखी हो गया और जिन्न के पास जाकर बोला…  

जिन्न भाई देखो यह मेरी पीठ पर क्या हो गया है। तुम इसे अपनी शक्ति से ठीक कर दो। यह बहुत भदा दिख रहा है।  मैं यह नहीं कर सकता ! क्योंकि यह भदा कूबड़ तुम्हें सज़ा के तौर पर दिया गया है। अब तुम आराम से सो सकते हो। 

तब से ले कर आज तक ऊंट की पीठ पर कूबड़ बना हुआ है। ऊंट अब इस बात को समझ गया की यह सब उसके आलस के कारण हुआ है और फिर वह सभी काम समय पर करने लगता है।  

शिक्षा : हमें यह शिक्षा मिलती है की हमे अपना काम समय पर करना चाहिए और कभी भी आलस नहीं करना चाहिए। 

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पांडा की दोस्ती

एक बार की बात हैं। किसी बर्फीले पहाड़ की चोटी पर ध्रुवीय भालू रहते थे। उसी पहाड़ पर नीचे की तरफ बहुत सारे पांडा भी रहते थे।बहुत दूर-दूर रहने ...