21 August 2018

पंचतंत्र की कहानी - जादुई बाज

बहुत पुरानी बात है किसी गाँव में एक बिल्लू नाम का मछुवारा रहता था। उसकी पत्नी का कुछ साल पहले देहांत हो गया था। और उसके बच्चे भी नहीं थे इसलिए वो बिल्कुल अकेला था। वह गाँव के पास ही एक नदी से मछलियां पकड़कर लाता और उनको बेचकर अपना पेट भरता था। समय के साथ वो बूढ़ा हो गया था। जिसके कारण अब वो मछलियां नहीं पकड़ पाता था। मछुवारा दिन पर दिन काफी  कमजोर होता जा रहा था। और उसके पास आय का कोई दूसरा साधन भी नहीं था। जिससे वो अपने भोजन का प्रबंध कर सके। एक दिन मछुवारे को बहुत भूख लगी| कुछ सोचकर वो अचानक नदी की तरफ चल दिया। कुछ दूर जाने पर उसने देखा एक बाज घायल अवस्था में सड़क के किनारे पड़ा दर्द से तड़प रहा था। देखने में वो कोई जादुई बाज जैसा लग रहा था, उसके पंख सोने के थे।

उसके पंजो से खून निकल रहा था। मछुवारे से उसकी ये हालत देखी नहीं गई| वो उसे उठाकर अपने घर ले गया।  घर ले जाकर मछुवारा ने बाज की मरहम-पट्टी कर दी । बाज उससे खुश होकर कहता है, "तुम बहुत ही दयावान हो दोस्त, वरना कितने लोग उस रास्ते से गुज़रे थे, पर किसी ने भी मुझे उठाकर नहीं देखा केवल तुम ही एक ऐसे थे जिसने मुझे उठाया और मेरी मदद की, मैं तुम्हारा शुक्रिया अदा कैसे करूँ? ये मैं  खुद भी नहीं जानता दोस्त". पक्षी की ऐसी बातें सुनकर मछुवारा कुछ देर तक काफी स्तब्ध रहता है और कहता है, "मैंने ऐसा कुछ नहीं किया दोस्त, जो मुझे महान बनाए, मैंने वही किया जो इंसानियत के नाते हर कोई करता। तुम ठीक हो ये जानकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई।



बाज मछुवारे को देखकर मुस्कुराता है और उससे कहता है, "दोस्त, तुम्हारी इस मदद का मैं किसी भी तरह एहसान चूका सकू तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी। फिर बाज ने आस पास देखा और उससे पूछा, "क्या तुम्हारे साथ कोई नहीं रहता?" यह सुनकर मछुवारा निराश होकार धीरे से हाँ में सिर हिलाता हैं। बाज समझ जाता है और मछुवारे से कहता है, "तुम्हारी हालत देखकर लगता है तुम बहुत बीमार रहते हो, और बूढ़े भी हो चुके हो। तुम्हारे साथ कोई रहता भी नहीं जो तुम्हारी देख-भाल कर सके और तुम्हारे लिए भोजन का प्रबंध कर सके। क्यों ना मैं तुम्हारे लिए रोज़ाना भोजन का प्रबंध कर दिया करूँ? ये सुनकर मछुवारा काफी खुश होता हैं। उस दिन से बाज मछुवारे के लिए पास की ही नदी से मछलियां लाने लगा जिससे मछुवारे को अपने खाने के प्रबंध में काफी मदद मिली। जिससे मछुवारे की सेहत में काफी सुधार हुआ।

लेकिन मछुवारे के मन में बाज के पंखो को लेकर लालच जाग रहा था। वो हमेशा बाज की नज़र बचाकर उसके पंखों को देखता और उन्हें पाने की योजना बनाता था। वो हमेशा ही उसके पंखो को देखकर सोचता था, " ये बाज इतना होशियार है कि मेरे लिए रोज़ एक मछली का प्रबंध करता है, और इसे कोई थकान भी नहीं होती। सबसे ज़्यादा आकर्षित तो मुझे इसके पंख लगते हैं। काश ये पंख मुझे मिले होते तो मेरा तो भाग्य ही चमक जाता" इस तरह मछुवारे के मन में उसके पंखो को लेकर लालच आ गया और वो उसे पाने की हर सम्भव कोशिश करने लगा।और वही बेचारा बाज दिन -रात उसकी मदद करता और उसके इलावा कुछ नहीं सोचता।

एक दिन मछुवारे के दिमाग में एक योजना आती हैं। अपनी योजना अनुसार वो एक पेड़ के पीछे छुप जाता हैं। और बाज के आने का इंतज़ार करता रहता हैं। जैसे ही बाज वहां  आता है मछुवारा उस पर चाकू से हमला कर देता हैं। जिससे वो बाज वहीं मर जाता हैं। और एक राख के ढेर में बदल जाता हैं। तभी उस राख के ढेर से एक साधु प्रकट
हो जाते  हैं। और उस मछुवारे से कहते हैं, "मुझे एक श्राप मिला था जिसके कारण मैं एक बाज बन गया था और मुझे ये कहा गया था कि जब कोई इंसान अपने लालच के कारण मेरी हत्या कर  देगा तब मैं इस श्राप से मुक्त हो जाऊंगा, और जो तुम्हे मारेगा वो खुद इस श्राप के चलते बाज बन जाएगा। अब ये कर्म तुम पर भी लागु हो चुका हैं, अब तुम किसी और लालची की प्रतीक्षा करो जो अपने लालच के कारण तुम्हे मारेगा तभी तुम इस श्राप से मुक्त हो पाओगे।

इस तरह मछुवारा उस श्राप के कारण एक सोने के पंखो वाला बाज बन गया और फिर किसी और लालची इंसान की तालाश में निकल पड़ा |

शिक्षा- हमें कभी भी लालच में आकर गलत कदम नहीं उठाना चाहिए, क्योंकि नुक्सान हमारा ही होता है।


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17 August 2018

ताकत और चतुराई

बहुत समय पहले एक कौवा और उसकी पत्नी कहीं दूर से आए और एक पेड़ पर घोंसला बनाकर रहने लगे। दोनों सुबह दाना चुगने निकल जाते और शाम होने पर वहीं लौट आते। कुछ दिनों तक ऐसा चलता रहा। फिर एक दिन कौवे की पत्नी ने कुछ अंडे दिए। अंडो को देख दोनों बहुत खुश थे।

कौवा: कुछ दिनों में हमारे घोंसले में छोटे-छोटे बच्चे होंगे!

एक दिन जब वो दोनों दाना चुगकर लौटे तो उन्होने देखा कि कोई उनके सब अंडे खा गया है। ये देखकर दोनों बहुत दुखी हुए।

कौवा: हे भगवान! कोई हमारे सब अंडे खा गया!

उन्होने आसपास रहने वाले चिड़िया और बाकी पक्षियों से भी पूछा। पर किसी को नहीं पता था कि उनके अंडे किसने खाये। कुछ दिनों तक दोनों बहुत दुखी रहे। फिर कुछ समय बाद कौवे पत्नी ने कुछ और अंडे दिए। इस बार दोनों ने तय किया कि वो अंडों का पूरा ध्यान रखेंगे।

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कौवा: आज से हम दोनों में से एक दाना चुगने जाएगा और दूसरा अंडों के पास रहेगा।

कौवा और उसकी पत्नी की तरकीब सफल रही। कुछ दिनों तक उनके अंडों को कुछ नहीं हुआ। फिर एक दिन जब कौवे की पत्नी घोंसले में अंडों के साथ अकेली थी तो उसने देखा कि एक काला साँप रेंगता हुआ उसके घोंसले की तरफ आ रहा है। काले साँप को देखते ही वो समझ गयी कि इस काले साँप ने ही उसके अंडे खाए थे।

कौवे की पत्नी: इस काले साँप ने ही हमारे अंडे खाये थे!

और वो ज़ोर-ज़ोर से मदद के लिए चिल्लाने लगी।

कौवे की पत्नी: ये साँप मेरे अंडे खाने आ रहा है! कोई इस दुष्ट साँप को भगाओ!

कौवे की पत्नी मदद के लिए चिल्लाती रही, लेकिन कोई उसकी मदद के लिए नहीं आया। और काला साँप उसके सारे अंडे खा गया।

शाम को जब कौवा दाना चुगकर लौटा तो उसने देखा कि उसकी पत्नी का रो-रो कर बुरा हाल था और अंडे टूटे हुए थे। ये देखकर कौवा हैरानी से उससे पूछने लगा...

कौवा: क्या हुआ? अंडो का ये हाल किसने किया?

कौवे की पत्नी: काले साँप ने! वो वहाँ सामने वाले पेड़ की खोल में रहता है!

ये सुनकर कौवे को बहुत गुस्सा आया। उसने सामने वाले पेड़ की तरफ देखा तो काला साँप अपने बिल के बाहर बैठा था। कौवे ने उससे गुस्से से कहा...

कौवा: काले साँप, अगर तुमने हमारे अंडे खाने बंद नहीं किए तो तुम्हें इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।

काला साँप: कैसा परिणाम? तुम दो कौवे मेरा कुछ नहीं कर सकते, और मैं चाहूँ तो तुम्हें आसानी से खा सकता हूँ। इसलिए मुझे धमकी देना बंद करो। मैं जो चाहूँगा वो करूंगा।

साँप की बात सुनकर कौवे की पत्नी बहुत दुखी हुई और कौवे से कहने लगी...

कौवे की पत्नी: ये सांप कभी नहीं मानेगा। हमें ये घोंसला छोडकर कहीं दूर चले जाना चाहिए।

पर कौवा नहीं माना।

कौवा: हमने कुछ गलत नहीं किया। इसलिए हम कहीं नहीं जाएँगे। अगर यहाँ से कोई जाएगा तो वो काला साँप।

कौवे की पत्नी: पर कैसे?

कौवा: इसके लिए हमें कुछ उपाय सोचना होगा।

ऐसा कहकर दोनों सोचने लगे। तभी कौवा को याद आया...

कौवा: पास ही लोमड़ी मौसी रहती हैं। वो बहुत ही चतुर और समझदार हैं। हमें उनसे मिलने जाना चाहिए।

ये सोचकर दोनों लोमड़ी मौसी के पास पहुंचे और उन्हे सारी कहानी बताई। लोमड़ी मौसी को उनकी कहानी सुनकर बहुत दुख हुआ। वो बोली...

लोमड़ी: काले साँप ने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया है। उसे इसकी सज़ा ज़रूर मिलनी चाहिए।

कौवे की पत्नी: हाँ, पर काला सांप बहुत ताकतवर है। हम उसे नहीं हरा सकते।

कौवा: इसलिए अब आप ही कुछ उपाय बताएं।

इसपर लोमड़ी मौसी कुछ देर सोचकर उनसे बोली।

लोमड़ी: तुम्हारी समस्या का हल मेरे पास है। तुम दोनों कल महल से रानी का मोतीयों का हार चुरा लाना और काले साँप के बिल में डाल देना। तुम्हारा काम हो जाएगा।

कौवे को यह तरकीब समझ नहीं आई। वो हैरान होकर पूछने लगा...

कौवा: सांप को हार देने से उसे दंड कैसे मिलेगा?

इस पर लोमड़ी मुसकुराते हुए बोली...

लोमड़ी: मुझ पर विश्वास रखो।

अगली सुबह कौवा और उसकी पत्नी महल गए। रानी के कमरे में पहुँचकर उन्होनें देखा कि एक कोने में रानी के गहने पड़े थे। उन गहनों में एक मोती का हार भी था। कौवे की पत्नी ने उस मोती के हार को अपनी चोंच में दबाया और उड़ गई। कौवा भी उसके पीछे कांव-कांव करता उड़ गया। सिपाहियों ने ये देखा तो वो भाला लिए उनके पीछे दौड़ पड़े। कौवा और उसकी पत्नी उड़ते हुए सांप के बिल पहुंचे। कौवे की पत्नी ने मोतीयों का हार सांप के बिल में डाल दिया और दोनों उड़कर अपने घोसलें में बैठ गए। पर एक सिपाही ने हार बिल में गिरते देख लिया।

सिपाही: हार इस बिल में है!

ये सुनकर सब सिपाही बिल में भाले मारने लगे। कुछ देर बाद भालो के वार से काला सांप मर गया। कौवा और उसकी पत्नी अपने घोसलें से ये सब देख रहे थे। उन्होने देखा कि उनका दुश्मन काला सांप मर गया है तो उन्होने चैन की सांस ली।

कौवा: लोमड़ी मौसी की सूझबूझ के आगे काले सांप की ताक़त नहीं टिक सकी।



तो बच्चों, इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि दुश्मन कितना भी ताकतवर हो उसे सूझबूझ से हराया जा सकता है
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जादूई बूटी और राक्षस

बहुत समय पहले किसी जंगल के पास एक छोटा सा गांव था। उस गांव में माखन सिंह अपने बेटे टिल्लू के साथ रहता था। एक बार वो शहद के लालच में मधुमख्खी के छत्ते को तोड़ने की गलती कर बैठा। जिसके कारण मधुमखियों ने उसकी आँखों में डंक मार-मार कर उसे अँधा कर दिया था। माखन सिंह के बेटे टिल्लू को अपने पिताजी की बहुत चिंता रहती थी।

एक दिन निराश होकर वो कहीं जा रहा था। तभी उसे गंगू मौसी मिली। वो उसका निराश चेहरा देखकर बोली, ”टिल्लू तुम इतने दुखी क्यों हो ?” इसपर टिल्लू बोला, “मौसी मैं पिताजी को लेकर बहुत दुखी हूँ. वो कुछ देख नहीं पाते इसलिए बहुत दुखी रहते है उन्हें देखकर मुझे बहुत दुःख होता है।” इस पर गंगू मौसी ने उसे सलाह दी, ”तुम नट्टू काका से मिलो, उनके पास तुम्हारी परेशानी का कोई न कोई हल ज़रूर होगा।


टिल्लू को गंगू मौसी का सुझाव बहुत अच्छा लगा। वो अगले ही दिन अपने पिताजी को लेकर नट्टू काका के पास गया। नट्टू काका ने माखन सिंह की आँखों में ध्यान से देखा और बोले, ”मैं तुम्हारे पिताजी की आंखें ठीक कर सकता हूँ, लेकिन उसके लिए मुझे कुछ जादुई-बूटियां चाहिए होंगी।” इसपर टिल्लू बोला,”कौन सी जड़ी -बूटी? आप मुझे बताइए मैं अपने पिताजी के लिए कोई भी जड़ी-बूटी लाने के लिए तैयार हूँ।” ये सुनकर नट्टू काका बोले, ”वो जादूई जड़ी-बूटी है. उसे लाने के लिए तुम्हें पहाड़ के उस तरफ घने जंगलों में जाना होगा।

टिल्लू ने पूछा, ”वो बूटी दिखती कैसी है?” “जिस बूटी से तुम्हें सफ़ेद रंग की किरणें निकलती दिखे बस समझ जाना वो ही जादुई बूटी है. बस एक बात का ध्यान रखना वहां एक भयानक राक्षस रहता है. वो तुम्हें आसानी से वो बूटी नहीं लेने देगा”. ऐसा कहकर काका ने उसे एक बूटी दे दी। बूटी देख टिल्लू बोला, “इससे क्या होगा?” काका हँसते हुए बोले, ”तुम इसे खाओगे तो तुम्हें पता चल जाएगा!“

टिल्लू अपने पिताजी के पास गया और बोला,”पिताजी आप चिंता मत कीजिये, मैं जल्द ही जादुई बूटी लेकर वापस आऊंगा।” पिताजी से आशीर्वाद लेकर टिल्लू घने जंगलों की और चल दिया। कुछ आगे जाकर उसने देखा कि जंगल में बड़े-बड़े पेड़ो के इलावा और कुछ नहीं था. तभी अचानक एक बहुत भयानक राक्षस उसके सामने आकर खड़ा हो गया। टिल्लू उसे देखकर डर गया। राक्षस ने उससे पूछा, ”कौन हो तुम और मेरे जंगल में क्यों आए हो?”

ये सुनकर टिल्लू उसे जादुई बूटी के बारे में बताने लगा. लेकिन तभी उसे याद आया, “नट्टू काका बता रहे थे कि ये राक्षस मुझे आसानी से वो जादुई बूटी नहीं देगा इसलिए मुझे कोई तरकीब सोचनी होगी। ये सोचकर टिल्लू बोला,”मैं दूसरे जंगल से आया एक व्यापारी हूँ। मैं तुम्हें उस चीज़ के बारे में बता दूंगा लेकिन पहले ये बताओ तुम मुझे उसके बदले क्या दे सकते हो?” राक्षस बोला, ”मैं तुम्हें इस जंगल के सारे फल दे सकता हूँ” इसपर टिल्लू बोला, “फल तो मेरे गांव में भी है। मुझे कुछ ऐसा दो जो कही और से नहीं मिल सकता। अगर तुम्हारे पास ऐसा कुछ नहीं है तो मैं चलता हूँ। ये कहकर वो पलटकर चलने लगा।

तभी राक्षस बोला ,”रुको! मेरे पास ऐसी बहुत सी जादुई जड़ी-बुटियाँ है जो तुम्हें कही नहीं मिलेगी! टिल्लू समझ गया कि राक्षस उसके जाल में फँस चूका हैं. वो अपनी ख़ुशी को छिपाकर हैरान होकर बोला,”सच ! तुम्हारे जंगल में ऐसी जड़ी-बुटिया हैं?” ”हाँ ऐसी जादुई जड़ी-बुटिया तुमने कही नहीं देखी होगी “ इतना कहकर राक्षस टिल्लू को पहाड़ी के दूसरी तरफ जादुई जड़ी- बूटियों के पास ले गया।

वहां बहुत सारी जादू जड़ी-बूटियां थी। सभी जड़ी-बूटियों में से तरह तरह की किरणें निकल रही थी। तभी टिल्लू ने देखा एक जड़ी-बूटी में से सफ़ेद रंग की किरणे निकल रही थी। वो उस बूटी की तरफ इशारा करके बोला, ”मैं वो वाली बूटी लूंगा!“
राक्षस आगे बड़ा और उसने वो बूटी लेकर टिल्लू को दे दी और बोला ,”अब तुम मुझे उस चीज़ का नाम बताओ जो मुझे और भी शक्तिशाली बना सकती हैं। इस पर टिल्लू पहले थोड़ा पीछे हटा और बोला ,”वो चीज़ हैं अक्ल. अगर तुम्हारे पास थोड़ी अक्ल और आ जाए तो तुम दुनिया के सबसे शक्तिशाली राक्षस बन सकते हो। क्योंकि अक्ल ही दुनिया की सबसे शक्तिशाली चीज़ हैं।
राक्षस बोला,” नहीं मैं हूँ सबसे शक्तिशाली!” इसपर टिल्लू बोला ,”मैंने तुम्हें अपनी अक्ल से बेवकूफ बनाकर तुमसे ये जादूई जड़ी-बूटी ले ली इसलिए अक्ल ही दुनिया की सबसे शक्तिशाली चीज़ हुई. और मैंने वादे के अनुसार तुम्हें उस चीज़ के बारे में भी बता दिया जिससे तुम और भी शक्तिशाली हो जाओगे, तो अब हमारा हिसाब बराबर हुआ”.

ये सुनकर राक्षस बहुत गुस्सा हो गया. वो चिल्लाकर बोला, ”तुमने मुझे पागल बनाया! मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगा”. “जब मैं तुम्हारे हाथ में आऊंगा तब कुछ करोगे ना?” यह कहकर टिल्लू जल्दी से दौड़ने लगा। राक्षस भी चिल्लाता हुआ उसके पीछे दौड़ा. तभी टिल्लू को नट्टू काका की बात याद आई और उसने नट्टू काका की दी बूटी खा ली। जड़ी-बूटी खाते ही उसमे बहुत शक्ति आ गई और वो बहुत तेज़ी से दौड़ने लगा, और राक्षस उसे देखता ही रह गया.

तेज़ी से दौड़ता हुआ टिल्लू अपने गांव पहुंचा। अपने गांव लौटकर उसने जादुई बूटी नट्टू काका को दी। नट्टू काका ने उस बूटी की दवा बनाकर जैसे ही टिल्लू के पिताजी के आँखों में डाली, उनकी आँखें एकदम ठीक हो गई और उन्हें सब दिखने लगा।

इस तरह टिल्लू ने अपनी अक्ल से उस शक्तिशाली राक्षस को भी हराया और अपने पिताजी की आँखें भी ठीक कर दी।

शिक्षा - दुनिया में अक्ल ही सबसे शक्तिशाली चीज़ है। और जिसके पास अक्ल हैं उसे कोई नहीं हरा सकता।

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13 August 2018

पंचतंत्र की कहानी - नकली तोता

एक समय की बात हैं जंगल में तोतों का एक झुंड रहता था। झुंड के सभी तोतों को बहुत ज़्यादा और बेमतलब बोलने की बहुत बुरी आदत थी। सभी हर समय ज़ोर-ज़ोर से और बेमतलब बोला करते थे। उन्ही में से एक मिठ्ठू नाम का तोता भी था। जो बहुत कम बोलता था। सभी तोते उसे नकली तोता कहकर चिढ़ाते थे। एक दिन दो तोते आपस में बात कर रहे थे इस पर भी मिठ्ठू तोता कुछ नहीं बोला। ये देखकर तोतों के मुखिया ने कहा, “तोतों का तो काम ही होता हैं बोलना। ये मिठ्ठू इतना कम बोलता है, इसलिए ये असली तोता नहीं हो सकता। ये नकली तोता है!” पर मिठ्ठू किसी की बात का बुरा नहीं मानता था। और ना ही कभी किसी की बराबरी करने की कोशिश करता था।

एक दिन मुखिया की पत्नी का हार चोरी हो गया। मुखिया की पत्नी ने मुखिया से रोते हुए कहा, “किसी ने मेरा हार चुरा लिया है। लेकिन मैंने उस चोर को भागते हुए देखा है। वो चोर इसी झुंड में से कोई हैं।” ये सुनकर मुखिया ने झुंड के सभी तोतों को जमा होने के लिए कहा। जब सभी तोते जमा हो गये तो मुखिया बोला, “किसी ने मेरी पत्नी का हार चुरा लिया है। लेकिन मेरी पत्नी ने उस चोर को भागते हुए देख लिया था। उसने मुझे बताया कि उस चोर की चोंच लाल रंग की है और हमारे झुंड में लाल रंग की चोंच सिर्फ हीरु और मिठ्ठू की ही है।” ये सुनकर सभी तोते जोर-जोर से बोलते हुए मुखिया को इन्साफ़ करने के लिए कहने लगे |

झुंड के इस बर्ताव को देखकर मुखिया सोचने लगा, “ये सभी तोते मेरे प्रीय हैं। मैं इनमें से किसी पर शक नहीं कर सकता। ये सोचकर उन्होंने पास में रहने वाले एक बुजुर्ग कौवे की सहायता मांगी और उन्हें चोर का पता लगाने को कहा। कौवे ने मुखिया की बात मान ली।

अगले दिन सभी तोते मुखिया के घर के बाहर जमा हुए। कौवे ने पहले मिठ्ठू और हीरु तोते को गौर से देखा और फिर पूछने लगे, “तुम दोनों चोरी के वक़्त कहाँ थे?” इसपर हीरु तोता ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगा, “मैं शाम को दाना चुगकर लौटा तो बहुत थका हुआ था, इसलिए खाना खाकर मैं उस रात जल्दी अपने घौंसले में सो गया था”। और वहीं दूसरी तरफ मिठ्ठू तोता बड़े आराम से और धीरे से बोला, “मैं अपने घौंसले में सो रहा था।” कौवे ने दोबारा पूछा, “तुम दोनों अपनी बात साबित करने के लिए क्या कर सकते हो?” इसपर एक बार फिर हीरु तोता ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगा, “मेरे बारे में सब जानते हैं। मैं कभी झूठ नहीं बोलता। ये चोरी इस नकली तोते ने ही की हैं, तभी चुप-चाप खड़ा हैं।

“मैंने चोरी नहीं की”। मिठ्ठू का शांत और मीठा जवाब सुनकर कौवा मुस्कुराकर बोला, “चोरी हीरु तोते ने ही की हैं!”। कौवे की बात सुनकर सबको बहुत हैरानी हुई। मुखिया ने बुज़ुर्ग कौवे से पूछा, “आप कैसे कह सकते हैं कि चोरी हीरु तोते ने की हैं?” इसपर बुज़ुर्ग कौवा बोला, “हीरु तोता ज़्यादा बोलकर अपने झूठ को सच साबित करने की कोशिश कर रहा था. जबकि मिठ्ठू तोता जानता था कि वो सच्चा हैं, इसलिए वो सच बोल रहा था। वैसे भी हीरु तोता बहुत ज़्यादा बोलता हैं। इसलिए उसकी बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता।”

ये सुनकर सभी तोते गुस्सा हो गये और हीरु को कड़ी से कड़ी सजा देने की बात कहने लगे. लेकिन तभी मिठ्ठु तोता बोला, “मुखिया जी, हीरु तोते ने पहली बार ऐसी गलती की हैं। और उसने अपनी गलती की माफ़ी भी मांग ली. इसलिए आप उसे माफ़ कर दीजिये”. मिठ्ठू की बात मानकर मुखिया ने हीरो तोते हो माफ़ कर दिया ।

इस घटना से सभी तोतों को समझ आ गया कि ज़्यादा बोलने से हमारी बातों की महत्ता ख़तम हो जाती है। और उस दिन के बाद से सभी तोते कम बोलने लगे।

शिक्षा - हमें कम और मीठा बोलना चाहिए क्योंकि कम बोलने से बातों की महत्ता बनी रहती है।

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11 August 2018

पंचतंत्र की कहानी - मुर्ख शेर

बहुत समय पहले किसी जंगल में शेरसिंह नाम का एक शेर रहता था | शेरसिंह उस जंगल का राजा था | वह बहुत ताक़तवर होने के साथ-साथ बहुत गुस्से वाला भी था| कभी-कभी वो इतना गुस्सा हो जाता था कि गुस्से में बहुत गलत फैसले ले लेता था, जिसका फल जंगल के दूसरे जानवरों को भुगतना पड़ता था|

एक दिन वो अपने साथी बबलू चीते के साथ नदी के किनारे सैर कर रहा था | तभी नदी को देखकर उसने बबलू से पूछा, “बबलू, ये नदी हमारे जंगल से निकलकर कहाँ जाती है?” इस पर बबलू बोला, “महाराज, ये नदी हमारे जंगल से निकलकर पूर्व दिशा की तरफ दूसरे जंगल में जाती है, और फिर दूसरे जंगल के जानवर भी हमारी ही तरह इस नदी के पानी का इस्तेमाल करते हैं” | ये सुनते ही शेरसिंह गुस्सा हो गया और चिल्लाकर बोला, “ये नदी हमारी है | और कोई हमारी नदी का पानी इस्तेमाल नहीं कर सकता | तुम आज ही जंगल की सीमा पर दीवार बनवा दो! हम अपना पानी किसी को नहीं देंगे |


बबलू जानता था ये गलत है, पर शेरसिंह के गुस्से के आगे वो कुछ नहीं बोल सका और उसने जंगल की सीमा पर दीवार बनवा दी  | दीवार देखकर शेरसिंह बहुत खुश हुआ | पर उसकी मूर्खता की वजह से नदी का पानी जंगल में जमा होने लगा और देखते ही देखते सभी जानवरों के घरों में घुस गया |

इससे परेशान होकर कुछ जानवर मदद के लिए बबलू के पास गए| बबलू उन्हें आश्वासन देते हुआ बोला, “आप सभी चिंता मत कीजिये | मैं कुछ करता हूँ” | बबलू का आश्वासन पाकर सभी जानवर वहाँ से चले गए|

बबलू जानता था शेरसिंह बहुत गुस्से वाला है| वो उसकी बात नहीं सुनेगा | तभी उसे एक तरकीब सूझी और वो अपने घर जाकर आराम से सो गया| फिर जैसे ही आधी रात हुई वो जागा और पास में ही रहने वाले बिल्लू भालू के पास गया| बिल्लू रोज सुबह सूरज निकलने पर एक बड़ा घंटा जोर से बजाता था जिससे शेरसिंह और सभी जानवरों को पता चलता था की सुबह हो गई है|

बबलू ने बिल्लू से कहा, “बिल्लू सुबह हो गई है, घंटा बजा दो”| ये सुनकर बिल्लू चौंककर बोला, “पर अभी तो आधी रात ही हुई है| महाराज को पता चला तो वो मुझे मार डालेंगे”| “तुम उसकी चिंता मत करो| तुम्हें कुछ नहीं होगा”| बबलू के ऐसा कहने पर बिल्लू ने जोर से घंटा बजा दिया|

घंटा बजते ही सभी जानवर जाग गए | शेरसिंह भी गुफा से बाहर आया| बाहर आकर उसने देखा कि चारों तरफ अंधेरा था| ये देखकर वो गुस्सा होकर बिल्लू से बोला, “क्या तुम्हें दिखाई देना बंद हो गया है?! तुम्हें दिखता नहीं सूरज निकलने में अभी बहुत देर है!”

ये सुनकर बिल्लू डर के मारे कांपने लगा | तभी बबलू बीच में बोल पड़ा, “महाराज, इसमें बिल्लू की कोई गलती नहीं है| बिल्लू ने तो रोज के समय पर ही घंटा बजाया है| लगता है जैसे आपने पूर्व में रहने वाले जानवरों का पानी रोका है ऐसे ही पूर्व के जानवरों ने सूरज को हमारे जंगल में आने से रोक दिया है| इसलिए अब हमें चाँद की रोशनी में ही रहना पड़ेगा”|

ये सुनकर शेरसिंह और भी ज़्यादा गुस्सा हो गया | उसने बबलू से पूर्व के जंगलों पर हमला करने के लिए सभी को तैयार करने को कहा| पर बबलू बोला, “महाराज, इतने अँधेरे में तैयारी कैसे होगी? और बिना तैयारी लड़ने गए तो हमारी हार पक्की है” | “तो तुम क्या चाहते हो, हम बिना सूरज के रहें? हम ऐसे अँधेरे में नहीं रहे सकते!” शेरसिंह के ऐसा कहने पर बबलू बड़ी चालाकी से बोला, “महाराज, अगर आप पूर्व के जानवरों के लिए पानी छोड़ दे, तो पूर्व के जानवर भी हमारे लिए सूरज को छोड़ देंगे। हम नदी के पानी के बदले पूर्व के जानवरों से सूरज का व्यापार तो कर ही सकते हैं ?

शेरसिंह को बबलू की ये सलाह अच्छी लगी | उसने तुरंत सीमा पर बनी दिवार तुड़वाने का आदेश दे दिया | जब तक दीवार टूटी तब तक असली में सूरज के निकलने का समय भी हो गया | देखते ही देखते सूरज की रोशनी पूरे जंगल में फ़ैल गई और नदी का सारा पानी भी घरों से निकलकर जंगल के बाहर चला गया| और, नदी फिर से पहले जैसी बहने लगी |

शिक्षा: हर परेशानी का हल कोई न कोई जरूर होता है | हमें बस शांत रहकर अपनी सूझ-बुझ से काम लेना चाहिए |

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