28 November 2018

जादुई बाँसुरी

रूप नगर के जंगल में एक साधु बाबा रहते थे। साधु बाबा बहुत दयालु और ज्ञानी थे। वह जंगल के सभी जानवरों का बहुत ध्यान रखते थे। उस जंगल में एक बंदर भी रहता था, जो सभी जानवरों की नक़ल करता था। जानवर उसकी इस आदत से बहुत परेशान थे, इसलिए वह सभी उसे खुद से अलग मानते थे। उससे कोई मित्र्ता नहीं करता था। 

इसलिए बंदर एक दिन साधु बाबा के पास गया और बोला, “प्रणाम बाबा!” साधु ने जवाब दिया, “खुश रहो ! - क्या हुआ तुम इतने दुखी क्यों हो? इसपर बंदर ने दुखी होकर कहा, “बाबा, मुझे इस जंगल के जानवर खुद से अलग मानते हैं। क्योंकि मैं इंसानों की तरह दो पैरों पर चल सकता हूँ, जिसके कारण जंगल के अन्य जानवर ना तो मुझसे मित्रता करते हैं और ना मेरी कोई बात सुनते हैं। मैं तो उनसे मित्र्ता करना चाहता हूँ।” इसपर साधु ने सोचते हुए कहा, “हम्म…. तुम चिंता मत करो। मैं इसका कोई ना कोई हल ज़रूर निकाल लूँगा।”

साधु बाबा अपनी कुटिया के अंदर गए और कुछ देर बाद एक बाँसुरी ले कर आये और बोले, “यह लो, तुम इस बाँसुरी को रख लो।” बंदर ने उस बाँसुरी को देखते हुए कहा, “पर बाबा, मैं इस बाँसुरी का क्या करूँगा?” साधु ने जवाब दिया, “यह कोई साधारण बाँसुरी नहीं है। यह एक जादुई बाँसुरी है। जब तुम इसे बजाओगे, तो सामने खड़ा जीव सम्मोहित हो जायेगा।” इसपर बंदर ने चौंकते हुए कहा, “हैं...... - जादुई बाँसुरी! क्या आप सच कह रहे हो?”


बंदर साधू बाबा से बाँसुरी लेकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर चला गया। घर पहुंच कर बंदर ने कुछ देर आराम करने के बारे में सोचा, “हह इस बाँसुरी का कमाल मैं शाम को देखूँगा, अभी मुझे कुछ देर आराम कर लेना चाहिए।” बंदर बाँसुरी को रख कर आराम से सो गया। वह उस बाँसुरी का कमाल देखने के लिए इतना उत्साहित था कि उसे सपने में भी सिर्फ बाँसुरी ही नज़र आती थी। जैसे ही दिन ढल गया बंदर जंगल में घूमने के लिए निकल गया और बोला, “आज तो मुझे बहुत मज़ा आने वाला है, अब मैं उन सबको मज़ा चखाऊंगा - जो मुझे खुद से अलग समझते हैं।”

बंदर को सामने से लोमड़ी, सियार और खरगोश आते हुए दिखाई दिए। उसने उन सभी जानवरों पर बाँसुरी को इस्तेमाल करने की योजना बनाई और कहा, “हम्म…. लोमड़ी, सियार और खरगोश तीनों एक साथ - क्यों ना इन्हें अपने बस में किया जाये !? बड़ा मज़ा आएगा।”   

बंदर ने बाँसुरी बजाना शुरू कर दिया और उसकी बाँसुरी सुनकर लोमड़ी ने बोला, “क्या बात है बंदर भाई - तुम तो बहुत अच्छी बाँसुरी बजा लेते हो। पूरे जंगल में ऐसा हुनर किसी के पास नहीं है।” इसपर बंदर ने जवाब दिया, “हाँ, ये तो तुमने बिलकुल सही कहा - पर फिर भी इस जंगल के जानवर मुझसे मित्र्ता नहीं करते।” सियार ने जवाब दिया, “नहीं-नहीं बंदर भाई, ऐसी बात नहीं है - हम सब तुम्हारे मित्र ही तो हैं, फिर और किसी की क्या ज़रूरत !?” बंदर सोच में पड़ गया और खुद से कहने लगा, “आज से पहले तो इन जानवरों ने मेरी तारीफ़ कभी नहीं की, फिर आज अचानक इन्हें क्या हो गया? हम्म..... लगता है यह सब इस जादुई बाँसुरी का कमाल है।”

इसपर खरगोश ने बंदर को देखते हुए पूछा, “क्या हुआ भाई ? तुम किस सोच में पड़ गए ?” बंदर ने जवाब दिया, “नहीं कुछ भी तो नहीं - मैं तो बस इस जंगल के जानवरों को परेशान करने के बारे में सोच रहा था।” लोमड़ी ने कहा, “अरे ये तो बहुत आसान है - तुम्हारा ये काम, हम सब मिलकर कर देंगे । तुम बस आराम करो।”

पेड़ पर बैठी कोयल रानी ने यह सब देख लिया। लोमड़ी, सियार और खरगोश ने पूरे जंगल में कोहराम मचा दिया था। सभी जानवर बहुत परेशान और चिंतित हो गए थे। तभी वहां कोयल रानी आयी। उसने सभी जानवरों को बंदर और उस जादुई बाँसुरी के बारे में विस्तार से बता दिया और कहा, “महाराज ! हमें किसी तरह उस बाँसुरी को बंदर से छीनना होगा।” इसपर शेर ने जवाब दिया, “वो बंदर इतना शैतान है, - उससे बाँसुरी लेना बहुत मुश्किल है। हमे इस समस्या का कुछ और हल निकालना होगा।” कोयल ने कहा, “फिर तो महाराज एक ही हल है - हम सबको साधु बाबा से सहायता लेनी चाहिए।” 

कोयल रानी की बात सुनकर सभी जानवर साधु बाबा के पास गए। जानवरों को परेशान देखकर साधु बाबा ने उनसे पूछा, “क्या हुआ ? तुम सब इतने दुखी क्यों हो?” हाथी ने जवाब दिया, “वो बंदर के हाथ ना जाने कहाँ से एक जादुई बाँसुरी लग गई है, जिसकी मदद से वो जंगल के अन्य जानवरों अपने बस में कर रहा है।”  यह सुनकर बाबा ने कहा, “वो बाँसुरी तो मैंने ही बंदर को दी थी। पर वो उस बाँसुरी का प्रयोग इतने गलत तरीके से करेगा, इसका तो मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था। इस समस्या का एक ही उपाय है - हमें किसी तरह उस बंदर से जादुई बाँसुरी को वापस ले कर तोड़ना होगा।”

सभी जानवर और साधु बाबा सोच में पड़ गए। काफी देर तक सोचने के बाद हाथी को एक तरकीब सूझी और वो बोला, “मेरे पास एक तरकीब है - हम सब जानते हैं, कि बंदर को दूसरे जानवरों की नक़ल करने की आदत है, तो क्यों ना हम उसकी इस आदत का फायदा उठाये !?” इसपर कोयल रानी ने कहा, “महाराज - वो सब आप मुझ पर छोड़ दीजिये, आप बस उस बंदर को दंड देने की तैयारी कीजिये।”

ऐसा कहकर कोयल रानी उड़ते हुए सीधे बंदर के पास गयी और बोली, “बंदर भाई - मैंने सुना है, की आप हर काम बहुत आसानी से कर लेते हैं।” बंदर ने जवाब दिया, “हाँ, तुमने बिलकुल सही सुना है। मेरे लिए हर काम आसान है।” इसपर कोयल रानी ने कहा, “अगर ऐसी बात है, तो मेरी तरह उड़ के दिखाओ।” बंदर ने हैरानी से बोला, “हैं...... पर मेरे तो पंख ही नहीं हैं, और बिना पंख के तो तुम भी नहीं उड़ सकती।”

कोयल ने कहा, “अच्छा, अगर ऐसी बात है, तो तुम वो करो - जो मैं अब करने वाली हूँ।” ऐसा कहकर कोयल ने पास में पड़ी लकड़ी को उठाया और उसे बीच में से तोड़ दिया। यह देखकर बंदर भी अपने आस-पास देखने लगा। पर उसे कोई लकड़ी नज़र नहीं आयी। इसलिए बंदर ने अपनी जादुई बाँसुरी को उठाया और उसे बीच में से तोड़ दिया। जैसे ही उसने बाँसुरी को तोड़ा, सभी जानवर उसके सम्मोहन से मुक्त हो गए। इस तरह कोयल ने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल कर जंगल के सभी जानवरों को शैतान बंदर से बचा लिया और प्रशंसा का पात्र बनी। शेर ने बंदर को जंगल से बाहर निकाल दिया और सभी जानवरों को उसकी शरारतों से भी छुटकारा मिल गया। सभी जानवर ख़ुशी-ख़ुशी जंगल में रहने लगे। 

शिक्षा- हमें अक्ल का इस्तेमाल किये बिना नक़ल नहीं करनी चाहिए। 
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17 November 2018

गरीब किसान

बहुत समय पहले की बात हैं किसी गाँव में एक अमीर साहूकार रहता था। उसे अपने पैसों पर बहुत घमंड था। एक दिन एक गरीब किसान उस साहूकार के पास मदद मांगने आया और कहने लगे, “सेठ जी, मुझे आपकी मदद की ज़रुरत हैं।” इसपर साहूकार ने कहा, “कैसी मदद?” किसान ने जवाब दिया, “मेरा सारा खेत बर्बाद हो गया हैं। मेरे पास कुछ काम नहीं हैं। मेरे बीवी बच्चे भूखे है घर पर खाने के लिए कुछ भी नहीं है सेठ जी।” साहूकार ने सोचा, “मैं अगर इसे पैसे उधर दे दूँगा, तो ये मुझे वापस लौटा नहीं पाएगा और मेरे पैसे बर्बाद हो जाएंगे।क्यों न मैं इसे अपने खेत में काम दे दू मुझे कुछ किसानों की ज़रूरत भी तो हैं।”  

इतना सोचकर उसने गरीब किसान से कहा, “ठीक हैं, कल से मेरे खेत में काम करने आ जाओ, मगर मैं तुम्हें सिर्फ दो सौ रुपए दूँगा। मंज़ूर हैं तो बोलो, वरना जाओ यहाँ से।” किसान मान गया। अगली सुबह से वो गरीब किसान साहूकार के खेत में काम करने आने लगा। अब धीरे-धीरे वह साहूकार उस गरीब किसान से खेत के साथ-साथ दूसरे काम भी करवाने लगा। लेकिन अभी भी वह उसे दिन भर की मेहनत के बस दो सौ रुपए ही देता था।


कुछ समय बाद साहूकार के खेत का काम खत्म हो गया। तो साहूकार ने सोचा, “मेरे खेत का काम तो हो चुका हैं तो अब मुझे इस किसान की कोई जरुरत नहीं हैं। अब मुझे इसे काम से निकाल देना चाहिए।” इतना सोच कर वह उस गरीब किसान के पास गया और कहा, “ये लो तुम्हारे पैसे, कल से तुम्हें आने की ज़रुरत नहीं हैं। खेत का काम भी खत्म हो चुका हैं।”  इसपर किसान ने उदास होकर बोला, “पर सेठ जी, मुझे मत निकालिये मुझे अभी काम कि ज़रुरत हैं। मुझे पैसों की ज़रुरत हैं।”

साहूकार ने कहा, “पर मैं क्या करूँ, मेरे खेत का काम खत्म हो चुका हैं। ये लो अपने पैसे और जाओ यहाँ से।” इतना कहकर उसने गरीब किसान को निकाल दिया। अगली सुबह वह गरीब किसान साहूकार के घर के बाहर आकर बैठ गया। सेठ ने उसे वहाँ देखकर हैरान होकर पूछा, “तुम यहाँ क्या कर रहे हो ? मैंने तो तुम्हें कल निकाल दिया था।”

साहूकार ने उसे डांट कर भगा दिया। मगर अगली सुबह किसान फिर उसके घर के बाहर आ कर बैठा गया। यह देखकर साहूकार ने उससे फिर पूछा, “तुम फिर मेरे घर के बाहर क्या कर रहे हो?” इसपर किसान ने जवाब दिया, “आप ही मुझे काम दे सकते हैं। कृपया मुझे काम दे दीजिये। आप पहले मुझे दो सौ रुपए देते थे।अब बेशक आप मुझे सौ रुपए ही दे दीजिए मगर मुझे काम पर रख लीजिये, सेठ जी।”

लेकिन अगले दिन वह किसान फिर साहूकार के घर के बाहर बैठ गया और फिर अगले कुछ दिनों तक ऐसा ही चला जिससे तंग आकर साहूकार ने उससे पीछा छुड़ाने के लिए एक तरकीब सोची, “यह गरीब किसान तो मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रहा । क्यों ना मैं दो-तीन दिन के लिए शहर चला जाऊँ।” ऐसा सोच कर साहूकार अगली सुबह किसान के आने से पहले ही अपने परिवार को लेकर शहर के लिए निकल गया। फिर कुछ समय बीत जाने के बाद वह साहूकार शहर से वापस आया और यह देख कर बहुत खुश हो गया की अब वह किसान उसके घर के बाहर नहीं आता है। ऐसे ही कुछ दिन बीत गए और फिर कुछ दिनों के बाद साहूकार ने सोचा, “ऐसा कैसे हो सकता हैं की इतने दिन बीत गए पर वह किसान मेरे घर नहीं आया आखिरकार उस किसान का हुआ क्या? उसे काम मिल गया या कुछ और मुझे पता लगाना चाहिए। ” 

इतना सोच कर फिर वह उसे ढूंढने निकल पड़ा। वह दूसरे खेतो में जा-जा कर किसानों से पूछने लगा, “क्या तुमने उस किसान को देखा ? जो कुछ दिन पहले मेरे खेत में काम किया करता था।” किसी भी किसान को उसके बारे में नहीं पता था। तभी अचानक से एक किसान आया और उसने बताया, “हाँ सेठ जी ! मुझे पता हैं कि वो किसान कहाँ गया। जब अाप कुछ दिनों से घर पर नहीं थे। तभी आपके घर में कुछ चोर आये थे, मगर किस्मत से उस वक़्त वो किसान भी वहीं था। उस किसान ने उन चोरों को रोकने की बहुत कोशिश की जिससे उनके बीच बहुत हाथापाई हो गयी जिसकी वजह से उस किसान को बहुत चोटें भी आयी हैं। इसलिए आज कल वो अपने घर पर आराम कर रहा है।” 

यह सुन कर साहूकार को अपनी गलती का एहसास हो गया था। वह उस गरीब किसान से मिलने उसके घर चला गया। और उससे कहने लगा, “मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया हैं। मुझे तुम्हारे साथ ऐसा नहीं करना चाहिए था। यह लो तुम्हारी अब तक की मेहनत की कमाई जो मैंने तुम्हें नहीं दी थी।” किसान ने साहूकार का शुक्रिया अदा किया। 

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14 November 2018

पंचतंत्र की कहानी - श्रापित दानव


सुंदरवन जंगल में बहुत सारे जानवर रहते थे। जिनके साथ बालू नाम का एक आदिमानव भी रहता था। बालू सभी जानवरों की बोली जानता था इसलिए वह जंगल में बहुत खास था। एक दिन जंगल में बहुत बड़ा दानव आया वह बहुत ख़ूँख़ार था। उसके सामने जो भी जानवर आता वह उसे तुरंत खा जाता। सभी जानवर दानव को देखते ही अपनी जान बचने के लिए यहाँ-वहां भाग रहे थे।  तभी एक खरगोश दानव के हाथ आ गया और दानव ने उसे खा लिया। 

खरगोश को खाने के बाद दानव बाकि जानवरों की तरफ बढ़ने लगा। सभी जानवर डर कर भागे-भागे बालू के पास गए। सबको अपने पास आता हुए देख बालू ने पूछा, “अरे! क्या हुआ? तुम सब इतना परेशान क्यों हो।” इसपर शेर ने जवाब दिया, “बालू भाई!! जंगल में एक दानव आ गया है। वह सभी जानवरों को मारकर खा रहा है।” बालू ने उस दानव के पास जाने के लिए कहा तभी शेर ने कहा, “नहीं नहीं वह बहुत भयंकर और खतरनाक है वह तुम्हें भी खा जाएगा।” इसपर बालू ने कहा, “नही वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा तुम बस मुझे उसके पास ले चलो।” फिर बंदर उसे दानव के पास लेकर गया। 





बंदर और बालू दानव के पास गए। बालू ने दानव से पूछा, “तुम कौन हो? जंगल के जानवरों को क्यों खा रहे हो?” इसपर दानव ने जवाब दिया, “मैं दूर गुफा में रहने वाला दानव हूँ। मैंने बहुत समय से कुछ नहीं खाया है। इसलिए मैं बहुत भूखा हूँ। अपनी भूख मिटाने के लिए मैं जानवरों को खा रहा हूँ। लेकिन अब मैं तुम्हें खा कर अपनी भूख मिटाऊंगा। यह सुनकर बालू बोला, “नहीं नहीं तुमने तबसे कितने जानवरों को मार कर खाया लिया है। अभी-अभी तुमने एक खरगोश को खाया है। आखिर तुम्हें इतनी जल्दी भूख कैसे लगा गयी ?”

इसपर दानव ने बोला, “तुम नहीं जानते मैं कितने समय से भूखा हूँ। एक-दो खरगोश खाने से थोड़ी ही मेरी भूख शांत होगी। मेरी भूख सिर्फ तालाब के मगरमच्छ ही मिटा सकते है। अगर तुम तालाब से मेरे लिए दो मगरमच्छ ले आओ। तो मैं इस जंगल के जानवरों को नहीं खाऊंगा। पर ध्यान रहे अगर तुम मगरमच्छ नहीं ला पाये तो सबसे पहले मैं तुम्हें खाऊंगा। बालू ने मगरमच्छ लाने को हाँ कह दिया और वो दोनों साथ में तालाब तक गए। 


जैसे ही बालू और दानव तालाब तक पहुंचे। दानव एक पेड़ के निचे बैठ गया। और बालू को तालाब में भेज दिया। बालू ने देखा की तालाब में सिर्फ एक ही मगरमच्छ था। यह देखकर बालू ने मगरमच्छ से पूछा, “इस तालाब के बाकि मगरमच्छ कहाँ है?” यह सुनकर मगरमच्छ ने बोला, “इस तालाब में सिर्फ मैं रहता हूँ।” बालू यह देखकर दुखी हो गया और बोला, “पर मुझे तो दानव ने दो मगरमच्छ लाने के लिए कहा है।”


यह सुनकर मगरमच्छ बोला, “अच्छा तो तुम्हें दानव ने भेजा है। क्या तुमने नहीं सोचा की दानव ने तुम्हें मगरमच्छ लेने के लिए क्यों भेजा है।” इसपर बालू जवाब दिया, “ क्योंकि शायद वह तैरना नहीं जानता।” मगरमच्छ ने बोला, “ नहीं वह तैरना तो जानता है, लेकिन एक संत के श्राप के कारण वह इसमें तो क्या किसी भी तालाब में नहीं तैर सकता। 

यह सुनकर बालू को एक तरकीब आयी और मगरमच्छ से मदद मांगी, “तुम मुझे अपनी पीट पर बिठा कर तालाब के उस पर ले जाओ।” मगरमच्छ बालू को तालाब के पार ले गया। 

बालू ने दानव को बुलाया, “दानव भाई मैंने मगरमच्छ पकड़ लिया है। पर इसे खाने के लिए तुम्हें तालाब के इस पार आना होगा नहीं तो मगरमच्छ पानी में वापिस चला जाएगा। मगरमच्छ को देखते ही दानव के मुँह में पानी आ गया। और वह यह भूल गया की तालाब के अंदर जाने से वो डूब जाएगा। दानव लालच में आकर तालाब के अंदर चला गया और डूब कर मर गया। इस तरह जंगल के जानवरों को दानव से छुटकारा मिल गया। उन सभी ने बालू का ध्यानवाद करा। 


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10 November 2018

पंचतंत्र की कहानी - खूनी झील

ढोलकपुर के जंगल में सभी जानवर मिल-जुल कर रहते थे। उस जंगल में एक झील भी थी। सभी जानवरों का यह मानना था वह एक खूनी झील है। क्योंकि जंगल में पानी पीने का कोई साधन नहीं था इसलिए जानवरों को झील के पानी से ही काम चलाना पड़ता था। वह इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि वह सब शाम होने से पहले ही अपने घर लौट जाएँ। क्योंकि जो भी उस झील के पास अकेला जाता था, वह कभी वापिस नहीं आता था। इसलिए जंगल के सभी जानवर झील के पास अकेले जाने से डरते थे। एक दिन, चुन्नू नाम का एक हिरन जंगल में रहने के लिए आया।

चुन्नू हिरन को अकेला देखकर जग्गू बंदर उसके पास आया और कहा, “अरे हिरन भाई, तुम कहाँ से आये हो, और तुम्हारा नाम क्या है ? आज से पहले तो तुम्हें इस जंगल में कभी नहीं देखा। इसपर चुन्नू ने जवाब दिया, “मेरा नाम चुन्नू है, और मैं दूसरे गाँव के जंगल से आया हूँ। यह सुनकर जग्गू ने कहा, “हम्म्म ! पर एक बात बताओ, तुम अपना जंगल छोड़ के इस जंगल में क्या करने आये हो?” इसपर चुन्नू ने कहा, “मैं इस जंगल में रहने आया हूँ, क्योंकि जिस जंगल में मैं रहता था, वहां मुझसे कोई प्यार नहीं करता, और ना ही कोई मेरे साथ खेलना पसंद करता था।”


जग्गू ने कहा, “अच्छा, यदि ऐसी बात है, तो तुम निश्चिन्त हो जाओ। इस जंगल के सभी जानवर बहुत अच्छे हैं। वह सब तुमसे दोस्ती जरूर करेंगे। मैं शाम को तुम्हें खुद सबसे मिलवाऊंगा, अभी तुम आराम कर लो, और हाँ अगर तुम्हें किसी भी चीज़ की जरुरत हो तो तुम मुझे बुला लेना। मैं सामने वाले पेड़ पर रहता हूँ।

चुन्नू ने कहा, “पर भाई, अपना नाम तो बताओ - मैं तुम्हें बुलाऊंगा कैसे ? और हाँ - यहां पानी पीने के लिए आस-पास कोई नदी या झील है क्या?” जग्गू ने कहा, “माफ़ करना दोस्त, मैं तुमसे बात करते-करते अपना नाम ही बताना भूल गया। मेरा नाम जग्गा है, यहां प्यार से सभी मुझे जग्गू बुलाते हैं। तुम भी मुझे जग्गू कह कर बुला सकते हो। यहां पास में ही एक झील है तुम वहां जाकर पानी पी सकते हो।”

चुन्नू ने कहा, “ठीक है जग्गू भाई, तुम्हारा बहुत धन्यवाद। मुझे तुमसे मिलकर बहुत ख़ुशी हुई। चलो मैं कुछ देर आराम कर लेता हूँ और तुमसे शाम को मिलता हूँ।” जग्गू वहां से चला गया। चुन्नू वहीं एक पेड़ के नीचे सो गया। शाम होने पर जग्गू बंदर ने चुन्नू हिरन को जंगल के सभी जानवरों से मिलवाया। तभी चुन्नू की मित्र्ता चीकू खरगोश से हो गयी। समय बीतता जा रहा था और उन दोनों की दोस्ती गहरी होती जा रही थी। एक दिन चुन्नू रोज़ की तरह पानी पीने के लिए शाम को झील पर गया। 

तभी चुन्नू को झील के अंदर से एक मगरमच्छ तेजी से अपनी और आता हुआ दिखाई दिया। चुन्नू डर के मारे कांपने लगा और किसी तरह वहां से भागता हुआ जंगल की तरफ गया। रास्ते में उसे चीकू खरगोश मिला और उसने कहा, “अरे-अरे चुन्नू भाई इतनी तेज़ी से भागते हुए कहाँ जा रहे हो?” इसपर चुन्नू ने जवाब दिया, “चीकू भाई, मैं झील पर पानी पीने गया था। वहां मुझे एक मगरमच्छ दिखा, जिसे मैने आज से पहले इस जंगल में कभी नहीं देखा,वो मेरी तरफ काफी तेज़ी से आ रहा था।”

चीकू ने कहा, “चुन्नू भाई, क्या तुम ये नहीं जानते की वह एक खूनी झील है?! तुम्हें शाम के वक़्त वहां अकेले नहीं जाना चाहिए।” तभी वहां जग्गू बंदर भी आ गया। चुन्नू ने सारी बात जग्गू को बताई। जग्गू ने चुन्नू से माफ़ी मांगते हुए कहा, “मुझे माफ़ करना चुन्नू भाई, मैं तुमसे बात करने में इतना व्यस्त हो गया था कि तुम्हें खूनी झील के बारे में बताना ही भूल गया। पर खूनी झील में मगरमच्छ कहाँ से आया?”

इसपर चीकू ने कहा, “हम्म्म ! इसका पता तो लगाना ही होगा। पर अभी आप दोनों इस बात का विशेष ध्यान रखना कि मगरमच्छ के बारे में किसी को भी कुछ पता नहीं चलना चाहिए।” चीकू पूरी रात सो नहीं पाया। वह इसी सोच में डूबा रहा कि आखिर खूनी झील में मगरमच्छ आया कहाँ से? कुछ देर सोचने के बाद चीकू खूनी झील का राज़ समझ गया।

चीकू मगरमच्छ का सच सबके सामने लाने के लिए अगली सुबह सभी जानवरों के साथ झील पर पहुंच गया। मगरमच्छ सबको एक साथ झील पर आता देख डर गया, इसलिए वो पानी के अंदर इस तरह छुप गया जैसे वह एक पत्थर हो। यह देखकर सभी जानवर एक साथ बोले, “अरे यह पत्थर झील में कहाँ से आया ? पहले तो यहां कोई पत्थर नहीं था।” इसपर चीकू बोला, “नहीं-नहीं। यह कोई पत्थर नहीं है, यह एक मगरमच्छ है।”

कोई भी जानवर उनका यकीन नहीं कर रहा था। चीकू मगरमच्छ की तरकीब समझ गया। इसलिए चीकू को एक आईडिया आया, “अरे हाँ, यह तो एक पत्थर ही है। लेकिन हम इस बात का यकीन तभी करेंगे अगर यह पत्थर हम सबको अपना परिचय खुद देगा।” यह बात सुनते ही मगरमच्छ जल्दी से बोल पड़ा, “हाँ, मैं एक पत्थर हूँ। और इस झील में कोई मगरमच्छ नहीं रहता। यहां तो बस मैं ही रहता हूँ।” इसपर चीकू ने हँसते हुए बोला, “अरे ओ मगरमच्छ, चल अब बाहर निकल। तू इतना नालायक है, कि तू यह भी नहीं जानता कि पत्थर बोलते नहीं हैं।”

सभी जानवर समझ गए की यह कोई पत्थर नहीं बल्कि एक मगरमच्छ था। उन सभी ने मिलकर मगरमच्छ को झील से भगा दिया, और इस तरह चीकू अपनी सूजबूझ से खूनी झील का सच सबके सामने ला पाया।

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1 November 2018

पंचतंत्र की कहानी - बुद्धिमान मधुमक्खी



किसी जंगल में मधुमक्खियों का एक झुंड रहता था। वह सभी जंगल के सबसे खुशबूदार और मीठे फूलों पर बैठा करती थी और उनका रस पीती थी। उन्ही में एक मिंटी नाम की मधुमक्खी भी थी। मिंटी बहुत ही नटखट और शैतान थी - लेकिन वह बाकि सब मधुमक्खियों से ज्यादा समझदार और बुद्धिमान थी। उसे अलग - अलग तरह के फूलों की काफी पहचान थी।

मिंटी हमेशा अपनी ही धुन में मग्न रहती थी। वो अपने मन मुताबिक काम किया करती थी। मधुमक्खियों का झुंड हमेशा जहाँ भी जाता था, साथ में ही जाता था लेकिन मिंटी हमेशा अपनी शैतानियों से उन सब को बहुत परेशान करती रहती थी झुंड से अलग जाकर ही रस पिया करती थी। इसी वजह से रानी मधुमक्खी मिंटी को हमेशा डाँटती थी। उस पर गुस्सा करती रहती थी, लेकिन मिंटी को इन सभी चीज़ो से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था। वह मस्त रहती थी। अपने दोस्त हाथी के साथ खेलती रहती थी।



ऐसे ही एक दिन जब वह मधुमक्खियाँ झुंड बनाकर रस पीने की लिए अपने छत्तों से बाहर निकली तो उन्होंने एक अजीब सी चीज़ देखी। उन्होंने देखा कि जिन फूलों का रस पीने के लिए वह सभी अपने छत्तों से इतनी दूर जाती थी आज अचानक वह फूल खुद उनके छत्तों के नीचे आ गए थे। यह देखकर सभी मधुमक्खियाँ बहुत खुश हुई और उन मे से एक मधुमक्खी जल्दी से छत्ते में गयी और अपनी रानी मधुमक्खी को बाहर बुला लायी। बाहर आने के बाद रानी मधुमक्खी ने जैसे ही यह सब देखा, वह हैरान रह गयी। तभी एक मधुमक्खी बोली, “रानी जी, यह तो बहुत अच्छा हो गया। अब हमें फूलों का रस पीने के लिए अपने छत्ते से ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा।”

मिंटी की यह बात सुनकर रानी मधुमक्खी बोली, “मिंटी, तुम वैसे भी हमेशा हम सब से दूर रहकर ही रस पीती हो, तो तुम्हें अपने साथ ले जाने का क्या फायदा?” इसपर मिंटी ने बोला, “लेकिन मैं तो बस आप सब के साथ मस्ती करती हूँ। वैसे आज आप सब रस पीने के लिए किस जगह जा रहे हैं ? मुझे भी आप सब के साथ चलना है।”

रानी मधुमक्खी ने कहा,मिंटी, नीचे देखो। आज हम सब इन फूलों का रस पीने जा रहे हैं जो हमारे ही घर के नीचे नए नए उगे हैं।” रानी मधुमक्खी की यह बात सुनकर मिंटी ने नीचे की ओर देखा तो उसे वहाँ ढेर सारे रंग - बिरंगे फूल नज़र आये। थोड़ी देर तक उन फूलों को निहारते रहने के बाद मिंटी को उन फूलों में कुछ गड़बड़ सी लगी, जिसे देखकर वह रानी मधुमक्खी से बोली, “रानी जी, यह फूल सुरक्षित नहीं है। आप सब रस पीने इन फूलों पर मत जाइएगा।”

मिंटी की बात सुनकर सभी मधुमक्खियों को यही लगा कि मिंटी मज़ाक कर रही है। तभी उनमें से एक मधुमक्खी बोली, “हमें पता है तुम यह सब इसीलिए बोल रही हो ताकि हम सब यहाँ से चले जाये और तुम यहाँ अकेले इन फूलों का रस पी सको।” साथी मधुमक्खी की बात सुनकर मिंटी को गुस्सा आ गया और वह वहाँ से दूसरी जगह रस पीने के लिए चली गयी। बाकी मधुमक्खियाँ इसे भी मिंटी की कोई मस्ती समझकर उसकी बात को नज़रअंदाज़ करके फूलों की तरफ बढ़ने लगी।

वहाँ मिंटी अकेले, सब से अलग आराम से रस पी रही थी, लेकिन साथ ही उसे अपनी दोस्त मधुमक्खियों की चिंता भी सता रही थी। वह सोचने लगी, “उनमें से किसी ने भी मेरी बात नहीं मानी और उन फूलों की तरफ चली गयी, लेकिन अगर वह सब ज्यादा देर तक उन फूलों पर रस के लालच में बैठी रहेगी तो अपनी जान से हाथ धो बैठेंगे, अब यह बात मैं उन लोगो को कैसे समझाऊँ की वह फूल उनके लिये सुरक्षित नहीं हैं।”

यही सोचते हुए मिंटी वापस अपने छत्ते पर आ गयी। वहाँ का नज़ारा देखकर वो एकदम हैरान हो गयी। उसने देखा कि रानी मधुमक्खी और बाकि मधुमक्खियाँ उन फूलों से चिपकी हुई थी। वो सब खुद को वहाँ से आज़ाद करने के लिए छटपटा रही थी। यह देखकर मिंटी जल्दी से उनके पास गयी और बोली, “मैंने तुम सब से कहा था कि यह फूल सुरक्षित नहीं हैं। लेकिन तुम में से किसी ने भी मेरी बात नहीं मानी और इन फूलों का रस पीने के लिए आ गयी।” मिंटी की बात सुन कर रानी मधुमक्खी बोली, “मिंटी, तुम्हें कैसे पता चला की यह फूल सही नहीं हैं?” इस पर मिंटी ने जवाब दिया, “रानी जी, आप सब हर रोज़ बस एक ही जगह रस पीने जाते हैं और वहीँ से रस पीकर वापस अपने छत्ते में आ जाते है, लेकिन मैं हर रोज़ अलग - अलग जगहों पर घूमती हूँ और नयी - नयी चीज़े देखती व सीखती हूँ, जिससे मुझे सभी चीज़ो का ज्ञान हैं।” रानी जी, मुझे हर किस्म के फूलों की अच्छी पहचान भी हैं। जिस से इन फूलों को देखते ही मैं समझ गयी थी कि यह नकली फूल हैं जिनके ऊपर हमें फँसाने के लिए मीठा रस डाला गया है ताकि हम लालच में आकर इन फूलों पर बैठे और हमारे पैर और पंख इन पर चिपक जाये।”

मिंटी की यह बात सुन कर सभी मधुमक्खियां बहुत परेशान हो गयी और सोचने लगी कि इससे बाहर कैसे निकलेंगे? मधुमक्खियों को इतना परेशान देखकर रानी मधुमक्खी बोली, “अब हम क्या कर सकते हैं? मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा है। मिंटी, क्या तुम हमारी कोई मदद कर सकती हो?” मिंटी थोड़ी देर सोचने के बाद बोली, “हाँ रानी जी, मेरे पास इस से बाहर निकलने की एक तरकीब है। आप सब इस मुसीबत से बाहर निकल जायेंगे और किसी को भी अपनी जान नहीं गँवानी पड़ेगी।”

मिंटी की यह बात सुन कर सभी मधुमक्खियां खुश हो गयी। उनमें से एक मधुमक्खी ने बोली, “मिंटी, क्या तरकीब है तुम्हारे पास हमें यहाँ से आज़ाद करवाने की? जल्दी बताओ।” मिंटी बोली,यह मीठा रस इंसान अपने खाने में भी मिलाते हैं और एक बार मैंने एक इंसान को इस मीठे रस से चिपके हुए हाथ पानी से धोते हुए देखा था। तो अगर तुम सब के ऊपर पानी गिरे तो तुम इस रस की चिपचिपाहट से आज़ाद हो जाओगे।”

मिंटी की यह बात सुनकर रानी मधुमक्खी बोली, “लेकिन, मिंटी यहाँ हम सब के ऊपर पानी कैसे गिरेगा? यह तो बारिश का मौसम भी नहीं है।” रानी मधुमक्खी की बात सुनकर मिंटी सोचने लगी कि अब वह क्या करें जिससे सभी मधुमक्खियां उन फूलों की चिपचिपाहट से आज़ाद हो जाएँ और किसी को कोई नुक्सान भी ना पहुंचे! तभी मिंटी को याद आया कि उसका दोस्त हाथी उनकी मदद कर सकता है। वह जल्दी से अपने दोस्त हाथी के पास उससे मदद मांगने गयी। मिंटी की बात सुनने के बाद हाथी उसके साथ आ गया और अपनी सूंड में पानी भरके उन सभी मधुमक्खियों के ऊपर डालने लगा जिसके बाद वह सभी मधुमक्खियां धीरे-धीरे उन फूलों की चिपचिपाहट से आज़ाद हो गयी। आज़ाद होने के बाद सभी मधुमक्खियां ने हाथी और मिंटी का धन्यवाद किया और अपने छत्ते में वापस चली गयी।

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तीन भाई और पत्थर का घर

बहुत समय पहले, उत्तर प्रदेश के बिलासपुर गाँव में तीन भाई - राजेंद्र, गजेंदर, और सुरेंद्र रहते थे। तीनों भाइयों में बिलकुल भी नहीं बनती थी। उन्हें मिलजुलकर कोई भी काम करना पसंद नहीं था। जब वह छोटे थे, तब उनके पिता का निधन हो गया था। उनकी माँ खेती-बाड़ी करके घर चलाती थी। वह तीनों भी अपनी माँ की सहायता करते थे। एक दिन, उनकी माँ की तबियत ख़राब हो गयी। माँ ने अपने तीनों बेटों को बुलाया और उनसे कहा, “बच्चों, मैं अब बहुत समय तक जीवित नहीं रह पाउंगी। तुम तीनों मुझे बहुत प्रिय हो। मरने से पहले मैं बस तुम तीनों को अपने पैरों पर खड़ा देखना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि ऐसे झोपड़े में रहने की बजाय तुम्हारा एक बड़ा घर हो जिसमें तुम तीनों भाई साथ में, मिलजुलकर रहो। क्या तुम मेरी यह इच्छा पूरी करोगे?

माँ की यह बात सुनकर तीनों भाई सोच में पड़ गए। क्योंकि वह एक दूसरे को पसंद नहीं करते थे, उन्हें समझ नहीं आया कि वह क्या करे?!  अपनी माँ की ख़राब स्थिति को ध्यान में रख कर गजेंदर ने बोला, “ठीक है माँ। जैसा आपने कहा, हम ठीक वैसा ही करेंगे। बस आप पहले ठीक हो जाओ।”

गजेंदर का जवाब सुनकर माँ को संतुष्टि मिल गयी लेकिन राजेंद्र और सुरेंद्र को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने घर से बाहर जाकर गजेंदर से कहा, “तुमने माँ से ऐसा क्यों कहा कि हम तीनों साथ में रहेंगे?” इसपर गजेंदर ने जवाब दिया, “तुम दोनों कैसी बातें कर रहे हो? और इतना सोचने की ज़रुरत नहीं है। माँ को बस ठीक होने दो। इस बारे में हम फिर कभी बात कर लेंगे। मुझे भी कोई शौक नहीं है तुम दोनों के साथ सरखपाई करने का।”

तीनों भाइयों ने अपनी माँ के जल्दी से ठीक होने की प्रार्थना की। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद, उनकी माँ की मृत्यु हो गयी। माँ की मृत्यु के बाद तीनों भाई सोच में पड़ गए कि वह करें तो करें क्या?  गजेंदर ने माँ से कही हुई बात याद की। वह अपने भाइयों के पास गया और उनसे कहा, “भाइयों - मैं कुछ सोच रहा हूँ - क्यों ना हम तीनों साथ मिल कर कुछ काम करें - जैसा माँ चाहती थी?”



यह सुनकर सुरेंद्र गुस्से में बोला, “सोचना भी मत। मैं ना तो तुम्हारे साथ, और ना ही राजेंद्र के साथ कोई काम करूँगा। माँ बस चाहती थी कि हम तीनों काबिल बने और अपने लिए एक बड़ा सा घर बनाये।” अगले दिन, तीनों भाई ने अपनी सारी जमा-पूँजी को तीन हिस्सों में विभाजित किया और अपनी-अपनी राह चल दिए। तीनों भाइयों के पास अब अपनी जमा पूँजी को समझदारी से खर्च करके घर बनाने की चुनौती थी।

राजेंद्र ने सोचा, “मैं अपना घर बाँस और भूसे का बनाऊंगा। यह मेरे लिए काफी किफायती रहेगा। ऐसे मेरा घर भी जल्दी बन जाएगा और बचे हुए पैसे से मैं ज़रुरत का सारा सामान ख़रीद लूँगा। दूसरी तरफ, सुरेंद्र ने भी घर बनाने के बारे में विचार किया, “मैं अपना घर लकड़ियों का बनाऊंगा। लकड़ियों से बना हुआ घर ठंडा रहेगा और मैं आराम से सो पाउँगा। और तो और - बचे हुए पैसों से में अपने लिए आरामदायक गद्दे भी ले लूँगा।”

ऐसा सोचते हुए सुरेंद्र लक्कड़हारे के पास गया और अपना घर बनाने के लिए लकड़ियां खरीदने लगा। तीसरा भाई गजेंदर ने एक मजबूत घर बनाने के बारे में सोचा। उसने अपनी सारी पूँजी लाल पत्थर और चावल के आटे को खरीदने में लगा दी। फिर उसके पास बाकी सामान खरीदने के लिए पैसे ही नहीं बचे। गजेंदर ने हिम्मत नहीं हारी और खेती बाड़ी करके पैसे जोड़ने लगा।

कुछ समय के बाद, कड़े परिश्रम से गजेंदर ने अपना घर बनाने का सारा सामान इक्कठा कर लिया और अपना घर बनाना शुरू कर दिया। इसी बीच, सुरेंद्र और राजेंद्र ने अपना-अपना घर बनाकर तैयार कर लिया। कुछ महीनों के बाद, गजेंदर का घर भी तैयार हो गया था। वह बहुत खुश था। तीनों भाई अपने-अपने घरों में शांति से रह रहे थे।

एक दिन, बहुत तेज़ तूफ़ान आया। तूफ़ान आने की वजह से राजेंद्र का बाँस और भूसे का घर - और सुरेंद्र का लड़कियों का घर तहस-नहस हो गया। वह दोनों भागे-भागे गजेंदर के घर पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने देखा कि गजेंदर का घर वैसे का वैसा ही था। गजेंदर अपने भाइयों को देख कर खुश हो गया और उनसे कहा, “ऐसे बारिश में बाहर ही खड़े रहोगे या अंदर भी आओगे?” यह सुनकर राजेंद्र और सुरेंद्र घर के अंदर आ गए। उन्हें अपने व्यवहार पर बहुत शर्मिंदगी हो रही थी। तभी राजेंद्र ने कहा, “हमें माफ़ कर दो भाई। हम ने अपने लिए घर तो बना लिया - लेकिन यह भूल गए कि नींव मजबूत रखना बहुत ज़रूरी होता है।”  इसपर गजेंदर ने कहा, “ आखिर मदद की घड़ी में अपने ही तो अपनों के काम आते है। और तुम तो मेरे भाई हो। माँ भी हमेशा यही चाहती थी कि हम ज़रुरत के समय एक दूसरे की मदद करें।

उस दिन के बाद से, वह तीनों भाई ख़ुशी-ख़ुशी एक साथ गजेंदर के घर में रहने लगे और मिलकर काम करने लगे।

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