26 April 2019

कंगारू की बॉक्सिंग

किसी जंगल में बहुत सारे पक्षी और जानवर मिलजुलकर रहते थे ! वह हमेशा हर ऋतु का आनंद लेते थे।
वहा एक शेर भी रहता था जो कहता है  वाह दोस्तों ! आज तो मज़ा आ गया। कितनी चमकदार धूप खिली हुई हैं। कबूतर कहता है  हाँ शेर भाई ! बात तो तुम बिलकुल सही बोल रहे हो ! वरना कुछ दिनों से तो ठंड ने हमारी जान ही सुखा रखी थी। दूसरी तरफ बंदर कहता है अरे रे ! ठंड का तो पूछो ही मत, इस ठंड की वजह से मैं पिछले कुछ दिनों से भालू की गुफा में रह रहा हूँ। आज धूप निकली तो जान में जान आयी। 

कहाँ गर्मियों में यह धूप हमें एक आँख नहीं सुहाती और ठंड में वही चिलचिलाती धूप चमकती नज़र आ रही है ऐसा कौआ कहता है। भालू हस्ता है.....  हाहाहाहा। इसी पर सब हंसने लगते हैं, तभी वहाँ हिरण और तोता आते हैं। अरे दोस्तों क्या चल रहा है ? बहुत ठहाके लगाए जा रहे हैं। तोता कहता है  ज़रा हमें भी बता दो क्या बात है ? हम भी थोड़ा हंस लेंगे। कुछ देर ऐसे ही हंसी मज़ाक चलने के बाद कंगारू बॉक्सिंग करता हुआ आता है।

शेर (कंगारू को देखते हुए)  यह लो दोस्तों ! बॉक्सिंग किंग भी आ गए। इनके अंदर बॉक्सिंग के अलावा और कोई हुनर नहीं है। कोयल हस्ते हुए कहती है  हाहाहाहा ! और यह इकलौता हुनर भी किसी काम का नहीं है। कंगारू (गुस्से में)  कोयल से कहता है बॉक्सिंग करना मेरी आदत है। इससे मैं फुर्तीला रहता हूँ। और तो और, मेरा हुनर बहुत काम का है। इसकी अहमियत तुम सभी को एक दिन ज़रूर पता चलेगी। पीछे से बाज कहती है अरे, कंगारू भाई को तो गुस्सा आ गया ! अब कोई उनका मज़ाक नहीं बनाएगा, नहीं तो यह उसको पंच मार देंगे।

सभी जानवर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगते हैं। यह सब देखकर कंगारू को बहुत बुरा लगता है और वह उदास होकर चला जाता है। कंगारू कहता है  यह सब खुद को समझते क्या हैं ? खुद को तो कुछ आता नहीं है और मेरी बॉक्सिंग का मज़ाक बना रहे हैं। इन सभी के साथ रहने से अच्छा है, मैं यहाँ से चला जाऊँ। कंगारू अपनी जगह छोड़ कर जंगल के दूसरे कोने की तरफ चल पड़ता है। कंगारू को जाता देख कबूतर उड़ता हुआ अपने दोस्तों के पास पहुँचता है।

कबूतर बोला सभी सुनो ! मेरे पास एक खबर है। सभी पक्षी और जानवर कबूतर से पूछते है  क्या खबर ? कंगारू यह जगह छोड़ कर जंगल के दूसरी तरफ चला गया। कबूतर की बात सुनकर सभी जानवर हैरान हो जाते हैं और बहुत तेज़ हंसने लगते हैं। इतने में ही हार मान गया। अब हमारा मनोरंजन कौन करेगा ये शेर कहता है।

शेर के ऐसा बोलने पर सभी हंसने लगते हैं और बात को नज़रअंदाज़ करते हुए वहाँ से चले जाते हैं। देखते ही देखते समय बीतता है। एक दिन, साथ के जंगल में से एक जंगली हाथी और एक भालू उनके जंगल में घुस आते हैं और सारे जंगल में हड़कंप मचा देते हैं।

जंगली भालू तोड़-फोड़ करते हुए कहते है इसे भी तोड़ो ! उसे भी तोड़ो ! जो भी खाने को मिले, उसे बिलकुल न छोड़ो। जंगली हाथी पक्षियों के बच्चों को नुकसान पहुँचाते है और कहते है  यह पीदी बच्चें ! कितना ज्यादा शोर कर रहे हैं। भालू मैं तो कहता हूँ खा जा इन्हे तू। कुछ देर इसी तरह, जंगली भालू और हाथी जंगल में पक्षी और जानवरों को नुकसान पहुँचाते हैं और फिर चले जाते हैं।

तोता मन ही मन सोचता है अच्छा हुआ चले गए ! थोड़ी देर और रुकते तो न जाने और क्या करते?! सभी जानवर शांति से रहने लगते है, लेकिन कुछ दिनों बाद वह जंगली जानवर दोबारा वापस आ जाते हैं और आतंक मचाना शुरू कर देते हैं। इसी तरह धीरे-धीरे कुछ दिनों के अंतराल पर जंगल में आकर आतंक मचाना और सभी को परेशान करना उन जंगली  जानवरों कि आदत बन जाती है। सभी जानवर और पक्षी एक जगह इकट्ठा होकर बात करते हैं।

कौआ ने कहा  बाबा रे बाबा ! अगर यह जंगली इसी तरह यहाँ आते-जाते रहे तो, एक दिन यह हम सभी को खा जायेंगे। हमें खुद को और अपने बच्चों को इन जंगली जानवरों से बचाने के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा। लेकिन हम करेंगे क्या ? कबूतर कहने लगा  दोस्तों क्यों न हम एक साथ मिलकर उनसे लड़ाई करे ? क्या पता, वह हमारी तादाद देखकर डर कर यहाँ से भाग जाये। शेर बीच में टोकते हुए कहता है  नहीं ! हम तादाद में भले ही ज्यादा हो, लेकिन मुझे नहीं लगता कि हम इनसे जीत पायेंगे। सभी कोई तरकीब सोचने लगते है।

भालू कुछ देर सोचने के बाद कहता है  दोस्तों ! मेरे पास एक तरकीब है। कोयल भालू से पूछती है  कैसी तरकीब ? क्यों न हम इन जंगली जानवरों से लड़ने के लिए कंगारू कि मदद ले ? वह हमेशा बॉक्सिंग करता रहता है, इसलिए वह आराम से लड़ाई कर सकता है। ऐसे भालू ने कहा


भालू की बात पर सभी खुश हो जाते हैं, लेकिन तभी हिरण बोलता हैं। हमने आजतक कंगारू का बहुत मज़ाक बनाया है, क्या अभी भी आपको लगता है कि वह हमारी मदद करेगा ? लेकिन, एक बार उसके पास जाकर पूछने में हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। बंदर कहता है  बात तो तुम्हारी सही है। चलो जल्दी चलते है। इसके बाद सभी जानवर और पक्षी इकट्ठा होकर कंगारू के पास मदद मांगने जाते हैं।

शेर कंगारू, के पास जाता है और कहता है हमें तुम्हारी मदद की जरूरत है। प्लीज उन जानवरों से लड़ाई करके हमें और हमारे बच्चों को बचा लो। लेकिन, मेरी बॉक्सिंग तो बेकार है, किसी काम की भी नहीं है। तो फिर अब आप सभी को मेरी मदद की ज़रुरत क्यों पड़ गयी ? ऐसे कंगारू ने शेर से कहा।

कंगारू की बात सुनकर सभी बहुत शर्मिंदा होते हैं और उस से माफ़ी मांगते हैं। हमें माफ़ कर दो कंगारू भाई ! भालू कहता है  हमने तुम्हारा और तुम्हारे हुनर का मज़ाक बनाया। यह हमारी सबसे बड़ी गलती है। कोयल कहती है हम सब अपने किये पर बहुत शर्मिंदा हैं ! हमें माफ़ करके हमारी मदद कर दो, नहीं तो जंगल के साथ-साथ हम सभी का जीवन भी जल्द खत्म हो जायेगा। सभी को उनकी गलती का एहसास करते देख कंगारू उन्हें माफ़ कर देता है और उनकी मदद करने के लिए तैयार हो जाता है। तुम सभी को अपनी गलती का एहसास हुआ, यही मेरे लिए काफी है।बताओं - तुम्हें मेरी क्या मदद चाहिए ? 

कंगारू के पूछने पर भालू उसे सारी बात विस्तार से बताता है, जिसके बाद कंगारू कुछ सोच में पड़ जाता है।

कंगारू कुछ देर सोचने के बाद  मैं मदद तो कर सकता हूँ, लेकिन मैं उन दोनों से अकेले नहीं लड़ सकता।इसके लिए तुम सब को भी मेरी मदद करनी पड़ेगी। कंगारू के बात पर तोता कहता है पर हम तुम्हारी मदद कैसे कर सकते हैं ? हमें तो लड़ाई करनी भी नहीं आती। कंगारू  मैं सभी जानवरों को बॉक्सिंग सिखाऊंगा और जब हम सभी जानवर नीचे, उन दोनों जंगली जानवरों से लड़ाई कर रहे होंगे, उसी समय सभी पक्षी ऊपर से उनपर पत्थर से वार करेंगे। इस तरह हम सब मिलकर उन्हें हरा सकते हैं।

कंगारू की बात सुनकर सभी जानवरों के मन में उम्मीद जाग उठती है और वह कंगारू से बॉक्सिंग सीखने लगते हैं। इसी तरह कुछ दिन बीत जाते है और सभी जानवर लड़ाई के लिए अच्छी तरह तैयार हो जाते हैं। कुछ दिनों बाद जब वह जंगली जानवर वापस जंगल में आते है, तो बंदर उन्हें आते हुए देख लेता है।

बंदर अपनी दोस्तों से कहता है  चलो साथियों - हल्ला बोलें।

सभी पक्षी और जानवर मिलकर दूसरे जंगल के जंगली जानवरों पर हमला कर देते हैं और उन्हें जंगल से बाहर निकाल देते हैं।जानवरों के जंगल से भाग जाने पर सभी बहुत खुश होते हैं और कंगारू का शुक्रिया अदा करते है।इसके बाद से जंगल के सभी जानवर कंगारू के साथ प्यार से मिल-जुलकर रहने लगते हैं। 

शिक्षा : - इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती हैं कि हमें कभी किसी के हुनर का मज़ाक नहीं बनाना चाहिये।

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21 April 2019

भूतिया आईना - भाग 2

भूतिया आईना भाग-1 में बबली और चीकू अपने मम्मी-पापा के साथ नए घर में शिफ्ट हुए थे जहाँ उन्हें आईने का भूत सता रहा था। लेकिन चीकू की समझदारी और मम्मी-पापा की मदद से वह किसी तरह उस भूत से बच कर भागने में सफल रहते हैं।

महेश अपने परिवार के साथ घर से चले जाने के बाद उस घर को बेच देता हैं। घर के नए ख़रीदार का नाम अवनीश होता है जो अपनी बीवी और बेटे शेखर के साथ उस घर में शिफ्ट हो जाते है। वह तीनों अपने नए घर में आकर बहुत खुश होते है, और घर में इधर-उधर घूमने लगते हैं। घूमते हुए शेखर उस कमरे में पहुँचता है, जहाँ सारे आईने बंद होते हैं। 

शेखर कमरे में चारों तरफ देखते हुए कहता है, इस कमरे में इतने सारे आईने क्या कर रहे हैं ? इतना सोचते ही शेखर अपनी  मम्मी को इन सभी के बारे में बताने की सोचता है, यह सोचकर शेखर अपनी मम्मी के पास चला जाता है और उन्हें कमरे में रखे आईनों के बारे में बताता है। मम्मी उन सभी आइनों को घर में वापस उनकी जगह पर लगा देती है। और सभी उस घर में आराम से रहने लगते हैं। कुछ दिनों के बाद, रात को जब शेखर अपने कमरे में सो रहा था, तभी उसे एक आवाज़ सुनाई देती है। शेखर उठकर देखता है पर उसे कोई नज़र नहीं आता फिर वो सोचता है कहीं घर में कोई चोर तो नहीं घुस आया ?

ऐसा बोल कर शेखर अपने कमरे की लाइट जलाता है और इधर-उधर देखने लगता है। वह जैसे ही घर में देखने के लिए कमरे से बाहर निकलने वाला होता है - तभी उसे अपने पीछे से आवाज़ सुनाई देती है। शेखर पीछे मुड़कर देखता है तो उसे कुछ नज़र नहीं आता, शेखर अपने कमरे में वापस जाने लगता है की तभी अचानक पीछे से आवाज़ आती है, कहाँ जा रहे हो ? मैं तो यहाँ हूँ।

यह आवाज़ सुनकर शेखर डर जाता है, वह फिर से जैसे ही पीछे मुड़ता है - उसे आईने में एक परछाईं नज़र आती है, जो उससे बात करती है ! परछाईं उससे कहती है मेरे पास आओ ! मुझसे बात करो। मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूँगी। आईने में परछाईं देख शेखर बहुत डर जाता है, और कमरे से बाहर भागने की कोशिश करता है। लेकिन कमरे का दरवाज़ा नहीं खुलता। तभी परछाईं दोबारा बोलती हैं, इधर आओ ! क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगे ? मैं बहुत अच्छी हूँ।

लेकिन शेखर बहुत डरा हुआ था ! और डरते हुए कहता है ! तुम मुझसे दोस्ती क्यों करना चाहती हो ? प्लीज मुझे जाने दो। परछाईं को बहुत गुस्सा आता है और वो शेखर से कहती है यहाँ से कोई कहीं नहीं जायेगा।तुम ये बताओ कि मुझसे दोस्ती करोगे या नहीं ? शेखर को समझ नहीं आता की वह क्या करे ! वह अपने सामने से डरावनी परछाईं को बोलते देख डर कर रोने लगता है और बहुत तेज़ी से चिल्लाता है। शेखर के चिल्लाने की आवाज़ सुनकर मम्मी-पापा भागकर उसके कमरे में आते हैं।


तभी शेखर की मम्मी उससे पूछती है! क्या हुआ बेटा ? तुम चिल्लाये क्यों? शेखर घबराते हुए अपनी मम्मी को सब बात बताता है। शेखर की बात सुनकर उसके मम्मी-पापा आईने के पास जाते हैं और उसमे देखने लगते हैं। लेकिन उन्हें वहां अपने प्रतिबिम्ब के अलावा और कुछ नहीं दिखता। 

शेखर के पापा मम्मी उसे समझाते है ! यहाँ कुछ भी नहीं है। तुमने जरूर कोई बुरा सपना देखा होगा। लेकिन शेखर बहुत कोशिश करता है उन्हें समझने की पर उसके मम्मी-पापा उसकी बात नहीं समझते, शेखर की मम्मी उससे कहती है  बेटा ! आज तुम हमारे साथ सो जाओ।इस बारे में हम कल बात करेंगे।

इसके बाद शेखर के मम्मी-पापा उसे अपने कमरे में ले जाते हैं। अगली सुबह जब शेखर वापस अपने कमरे में जाता हैं, तो वह परछाईं उसे फिर दिखती है,  जिसे देखकर वह डर कर कमरे से बाहर भागता है और हॉल में चला जाता है। शेखर  सोच में डूबे हुए सोचता है, यह सब मेरे साथ क्या हो रहा हैं? यह परछाईं कौन है? और मेरे कमरे के आईने में क्या कर रही है? 

यह बोलता हुआ शेखर हॉल में घूमने लगता है और वहां टंगे हुए आईने के सामने पहुँचता है। जैसे ही वह आईने में देखता है तो वह डरावनी परछाईं वहां भी उभर आती है। परछाईं  शेखर से कहती है मुझसे बच कर कहाँ भाग रहे हो ? में इस घर के हर कोने में जा सकती हूँ - मैं हर उस जगह  हूँ, जहाँ जहाँ आईना है। तुम कब तक मुझसे बचोगे ?

शेखर उस परछाई से पूछता है,  तुम मेरा पीछा क्यों कर रही हो ? प्लीज मुझे छोड़ दो। वो परछाईं हॅसने लगती है, और कहती है ! ऐसा नहीं हो सकता। तुम्हें मुझसे दोस्तों करनी ही पड़ेगी। शेखर पूछता है लेकिन तुम सिर्फ मुझसे ही दोस्ती क्यों करना चाहती हो ? शेखर की इस बात पर वो परछाई उससे कहती है क्योंकि मैं सिर्फ बच्चों से ही दोस्ती करती हूँ ! और यहाँ तुम ही इकलौते बच्चे हो। शेखर उस परछाई से कहता है  नहीं, मुझे तुमसे डर लगता है।
ऐसा कहकर शेखर वहां से भाग जाता है और अपनी मम्मी के पास जाकर छुप जाता है।

शेखर की मम्मी उससे पूछती है क्या हुआ बेटा ? तुम इतने डरे हुए क्यों हो ? मम्मी के पूछने पर शेखर उन्हें परछाईं के बारे में  बताता है, जिसे सुनकर मम्मी थोड़ा घबरा जाती हैं। वह शाम को अवनीश को सारी बात बता देती हैं। इस बात पर शेखर के पापा उससे कहते है,- भूत जैसा कुछ नहीं होता ! इन सभी बातों पर भरोसा मत करो ! शेखर ने जरूर कोई डरावना सपना देखा होगा, इसीलिए यह सब उसके दिमाग में चल रहा है और वह सारी बातें तुम्हें बता रहा है। 

पापा की बात सुनकर मम्मी भी शेखर की बात पर ध्यान नहीं देती और वह लोग उसकी बात को नज़र अंदाज़ कर देते हैं। इसी तरह दिन पर दिन बीत्ते चले जाते है और अब परछाईं, शेखर से हर रोज़ बात करने लगती है। एक रात शेखर उस परछाईं से बात करते हुए पूछता है - तुम इस आईने में कैद कैसे हुई ? शेखर के यह पूछने पर परछाईं उदास हो जाती है और शेखर को अपनी कहानी बताने लगती है।

मैं भी तुम्हारी तरह ही एक बच्ची थी। मैं हमेशा सभी के साथ बहुत अच्छे से रहती थी और कभी भी किसी का बुरा नहीं सोचती थी। लेकिन कभी कोई भी बच्चा मुझसे दोस्ती नहीं करता था और हमेशा हर कोई मेरा मज़ाक बनाता रहता था। एक दिन, उन बच्चों ने मुझसे दोस्ती करने का वादा किया और फिर हम सभी खेलने के लिए इस खाली घर में आ गए ! यहाँ आने के बाद सभी ने कहाँ कि हम आईनों की भूल-भुलैया का खेल खेलेंगे ! और फिर वह सब मुझे आईनों से भरे एक कमरे में बंद करके वहां से चले गए। जिसके थोड़ी देर बाद बहुत तेज़ तूफान और बारिश शुरू हो गए। उसी वजह से शॉट सर्किट हुआ और सारे घर में आग लग गयी। उसी आग में जलकर मेरी मृत्यु हो गयी और उसी अकाल मृत्यु की वजह से मुझे मुक्ति नहीं मिली और मैं इसी घर में रह गयी और आईने में कैद हो गयी।

परछाईं की बातें सुनकर शेखर रोने लगता हैं और रोते हुए उससे बोलता हैं। मुझे लगा था कि तुम बहुत बुरी परछाईं हो और सभी को परेशान करने के लिए यहां रहती हो ! पर तुम तो यहाँ फंसी हुई हो। लेकिन क्या तुम्हारा, इस आईने से बाहर निकल कर आज़ाद होने का मन नहीं करता ? शेखर उस परछाई से पूछता है तुम इस आईने में कब तक कैद रहोगी ? क्या तुम्हें कभी आज़ादी नहीं मिल सकती ?

शेखर की बात सुनकर वो परछाईं कहती है, हाँ मुझे आजादी मिल सकती हैं। अगर कोई नेकदिल और सच्चा इंसान अमावस्या की रात को इस घर के सभी आईने तोड़ दे तो मैं इन आईनों और इस घर से मुक्त हो जाउंगी। अगले दिन शेखर अपनी मम्मी से अमावस्या के बारे में पूछता है। मम्मी, अमावस्या कब आएगी ?

शेखर की मम्मी उससे कहती है तुम यह सब क्यों पूछ रहे हो ? तो शेखर अपनी मम्मी से कहता है,- पहले आप मुझे बताइये अमावस्या कब आती है ? शेखर की मां उसे बताती है बेटा, अमावस्या दो दिन बाद ही है।

मम्मी की बात सुनकर शेखर बहुत खुश होता है और फिर दो दिन के बाद, अपने मम्मी-पापा को सारी बात बताता है और उन्हें अपनी बात पर विश्वास करने के लिए कहता है। वह सभी आईनों को घर की छत पर इकट्ठा करता है और एक-एक करके सभी आईने तोड़ देता हैं। सभी आइनो के टूटने के बाद एक धुआँ निकलता है और धन्यवाद शेखर कहते हुए आसमान में कहीं ग़ायब हो जाता है। यह सब देखकर शेखर के मम्मी-पापा हैरान रह जाते हैं और शेखर को गले लगा लेते हैं। इसके बाद वह सभी उस घर में ख़ुशी और शांति से रहने लगते हैं। 

शिक्षा :- हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमे कभी भी कुछ ऐसा नहीं करना चाहिए, जिससे किसी की जान खतरे में पड़ जाए। बल्कि हमेशा दुसरो की मदत करनी चाहिए।

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16 April 2019

पांडा की दोस्ती

एक बार की बात हैं। किसी बर्फीले पहाड़ की चोटी पर ध्रुवीय भालू रहते थे। उसी पहाड़ पर नीचे की तरफ बहुत सारे पांडा भी रहते थे।बहुत दूर-दूर रहने की वजह से पांडा और ध्रुवीय भालू का कभी आमना-सामना नहीं हुआ था । एक दिन एक बच्चा पांडा अपनी माँ से पूछता हैं। माँ ! हम कभी पहाड़ के ऊपर की तरफ क्यों नहीं जाते ? पांडा की माँ अपने बच्चे से कहती है क्योंकि, ऊपर की तरफ ध्रुवीय भालू रहते हैं। मैंने सुना है की वह बहुत खतरनाक होते हैं। इसीलिए हम कभी पहाड़ के उस तरफ नहीं जाते और न ही वह कभी नीचे की तरफ आते हैं। पांडा अपनी  माँ से पूछता है, आप उनसे मिली हो ? नहीं बेटा ! मैं उनसे कभी नहीं मिली। ऐसा पांडा की माँ उससे कहती है चलो अब तुम अपने दोस्तों के साथ खेलों और मुझे आराम करने दो।
इसके बाद वह बच्चा पांडा वहा से चला जाता है।एक तरफ जहाँ पांडा, ध्रुवीय भालू के बारे में पूछता है, वही दूसरी तरफ एक ध्रुवीय भालू का बच्चा भी अपने पापा से पूछता हैं।

भालू का  बच्चा  पापा ! हम हमेशा इस चोटी पर ही क्यों रहते हैं ? कभी नीचे की तरफ क्यों नहीं जाते ? भालू के पापा कहते है  क्योंकि, पहाड़ की नीचे की तरफ पांडा रहते हैं और मैंने सुना है की पांडा सिर्फ अपनों के साथ ही प्यार से रहते हैं। इसीलिए हम कभी नीचे की तरफ नहीं जाते और न ही कभी वह ऊपर की तरफ आते हैं।

भालू आपस में बात कर ही रहे होते है की तभी पहाड़ की चोटी पर भूस्खलन होता हैं।जिसकी आवाज़ पांडा तक भी पहुँचती हैं, लेकिन उसका असर सिर्फ ध्रुवीय भालुओं पर ही होता हैं।आवाज़ सुनकर सभी पांडा डर जाते है और एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं।

पांडा डरते हुए कहता है  यह डरावनी आवाज़ कैसी थी ?  जरूर पहाड़ की चोटी की तरफ भूस्खलन हुआ हैं। वहां तो ध्रुवीय भालू रहते हैं।वह सब ठीक तो होंगे न ? पांडा की माँ उसे कहती  है  वो हमें नहीं पता ! चलो सभी वापस अपने-अपने घर चलते हैं।

अगली सुबह बच्चा पांडा अपने दोस्तों के साथ खेलने के लिए घर से बाहर निकलता हैं ।थोड़ी दूर पहुंचने पर उसे एक जगह बहुत सारी मिट्टी पड़ी हुए नज़र आती हैं।

पांडा अपने मन में सोचता है यह मिट्टी का ढेर कल तक तो यहाँ नहीं था। अचानक इतने बड़े मिट्टी के ढेर को वहां देख पांडा असमंजस में पड़ जाता हैं। वह उस ढेर को देख ही रहा होता है की तभी उसके अंदर से एक पांडा बाहर निकलता हैं। पांडा चौंकते हुए दूसरे पांडा से कहता है  अरे ! तुम इस मिट्टी के ढेर में क्या कर रहे थे ? पांडा यह पांडा हमारे पहाड़ का तो नहीं लगता। इसका रंग भी हमसे कुछ अलग हैं। फिर वो उस पांडा से पूछता है  दोस्त तुम कहाँ से आये हो ? बताओ दोस्त ! तुम कौन हो ?  बच्चा भालू मन में सोचते हुए  लगता है, मेरे ऊपर मिट्टी लगने की वजह से यह लोग मुझे पहचान नहीं पाए और मुझे भी एक पांडा समझ रहे हैं। भालू का बच्चा  मैं कल रात ही इस पहाड़ पर नया आया हूँ। क्या तुम मुझसे दोस्ती करोगे ?




सभी बच्चें उससे दोस्ती करने के लिए हाँ बोल देते हैं और अब बच्चा भालू, पांडा के साथ रहने लगता हैं।


पांडा की माँ बच्चा भालू से पूछती है  बेटा ! तुम कौन से पहाड़ से आये हो ? भालू का बच्चा मैं यहाँ से थोड़ी दूर एक पहाड़ पर रहता हूँ।एक दिन परिवार के साथ घूमते हुए मैं गुम हो गया और भटकते हुए यहाँ पहुंच गया। पांडा का बच्चा अपनी  माँ से कहता है, आज से यह हमारे साथ ही रहेगा। भालू का बच्चा मन में सोचते हुए कहता है, यह पांडा कितने अच्छे है। लेकिन अभी भी यह मेरे साथ प्यार से इसीलिए रह रहे है क्योंकि मैं इन्हे एक पांडा लग रहा हूँ। पांडा भालू के साथ खेलता है और बाकी दोस्तों को भी साथ ले चलता है और कहता है  चलो दोस्त, हम सब मिलकर बाहर खेलने चलते हैं।

भालू ख़ुशी-ख़ुशी पांडा के साथ रहने लगता हैं।इसी तरह दिन बीतते जाते हैं।एक दिन सभी पांडा खेलने के लिए पहाड़ पर बह रही नहर के पास जाते हैं।भालू जब वहां पहुँचता है तो पानी देखकर घबरा जाता हैं। भालू का बच्चा मन में सोचते हुए  अगर यह पानी मुझपर गिर गया तो मेरी असलियत सबके सामने आ जाएगी। मुझे किसी भी तरह पानी से दूर रहना होगा।

भालू खुद को पानी से बचाने की बहुत कोशिश करता है, लेकिन खेलते-खेलते भालू को धक्का लगता है और वह पानी में गिर जाता है। जिसकी वजह से उसके ऊपर लगी मिट्टी हट जाती हैं। भालू को ऐसे देख सभी पांडा हैरान रह जाते हैं। पांडा हैरान होकर कहता है  तुम तो एक ध्रुवीय भालू हो। यह बहुत खतरनाक है।हमें जल्दी घर वापस चलना चाहिए।

सभी भागते हुए अपने घर वापस आ जाते हैं।उनके पीछे-पीछे भालू भी वहां आ जाता हैं।जिसे देखकर मादा पांडा बोलती हैं। पांडा की माँ भालू को देखकर कहती है  यह ध्रुवीय भालू यहाँ कैसे आया ? माँ, ये वही पांडा है। जो पिछले कुछ दिनों से हमारे साथ रह रहा था। ऐसा पांडा ने अपनी माँ से कहा।  भालू का बच्चा कहता है  आप सभी कृपया करके एक बार मेरी बात सुन लीजिये।मैं यहाँ किसी को नुकसान पहुंचाने नहीं आया हूँ। पांडा की माँ उससे पूछती है तो फिर तुम यहाँ क्यों आये हो ?

भालू का बच्चा उन्हें समझता है,  कुछ दिनों पहले पहाड़ की चोटी पर भूस्खलन हुआ था। जिसकी वजह से मैं पहाड़ के टूटे हुए टुकड़े के साथ नीचे गिर गया और यहाँ पहुंच गया।मेरे शरीर पर मिट्टी लगे होने की वजह से आप सभी ने मुझे भी पांडा समझ लिया और मेरे साथ प्यार से रहने लगे।मुझे वापस जाने का रास्ता भी नहीं पता था, इसीलिए मैं यहाँ रुक गया।  लेकिन तुमने हम सभी से झूठ बोला ! ऐसा पांडा की माँ भालू के बच्चे से कहती है। भालू  का बच्चा पांडा की माँ से माफ़ी मांगता है और कहता है उसके लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। तुम बहुत दिनों से हमारे साथ रह रहे हो ! इसीलिए मैं यह बोल सकती हूँ की तुम बहुत अच्छे हो। और हम सभी को तुमसे कोई दिक्कत नहीं हैं। भालू का बच्चा उनसे कहता है  मैंने सुना था की पांडा सिर्फ अपनों के साथ ही प्यार से रहते हैं, लेकिन आज आप सभी का व्यवहार ने इस बात बिलकुल गलत साबित कर दिया। हमने भी हमेशा यह ही सुना था की ध्रुवीय भालू बहुत खतरनाक होते हैं।लेकिन तुम बिल्कुल भी वैसे नहीं हो, हमें तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।

पांडा और भालू बातें कर ही रहे होते है, तभी भालू के पापा उसे ढूंढ़ते हुए वहां आ जाते हैं।अपने पापा को देखकर भालू बहुत खुश होता है और भागकर उनके पास जाता हैं। भालू के पापा उससे कहते है,  बेटा ! तुम ठीक हो ? मुझे तो लगा था की शायद मैं दोबारा तुमसे कभी नहीं मिल पाउँगा। पापा, आज मैं इन सभी पांडा की वजह से ही ज़िंदा हूँ ! अगर यह लोग मुझे अपने साथ रहने नहीं देते तो शायद ज़िंदा नहीं रहता। ऐसे भालू ने कहा भालू के पापा आपने मेरे बेटे की जान बचाई उसके लिए आप सभी का बहुत धन्यवाद।
इसके बाद सभी पांडा और भालू साथ मिलकर बहुत बातें करते हैं और कुछ देर बाद भालू अपने बेटे को लेकर वहां से वापस पहाड़ चोटी की तरफ चला जाता हैं।जिसके बाद पांडा और ध्रुवीय भालू हमेशा अच्छे दोस्त बनकर रहने लगते है।

शिक्षा :- हमें कभी किसी को जाने बिना उसके बारे में कोई राय नहीं बनानी चाहिए और हमेशा सभी के साथ मिलकर रहना चाहिए।  

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12 April 2019

अर्जुन और शाकाल

हिमाचल प्रदेश में एक बहुत घना जंगल था। उस जंगल में एक बहुत बड़ी गुफा थी, जिसमे सीताराम नाम के एक साधु काफी समय से साधना कर रहे थे। सीताराम बहुत ज्ञानी और समझदार साधु थे। वह कभी किसी कि सहायता करने से पीछे नहीं हटते थे। वह जंगल के जानवरों की भी बहुत देखभाल करते थे। एक दिन पास के गाँव में रहने वाले आदित्य, अर्जुन, नेहा और भास्कर नाम के चार बच्चे जंगल में घूमने के लिए आये।

आदित्य बोला यह जंगल कितना घना है। नेहा बोली यह जंगल घना ही नहीं बहुत डरावना भी है । हाँ, तुम दोनों ठीक बोल रहे हो, देख कर ऐसा लगता है अर्जुन बोला। यहाँ कभी भी किसी लकड़हारे की नज़र नहीं पड़ी। वरना गाँव के तो सभी पेड़ों को लोग धुएं में उड़ा चुके हैं ।”

सभी बच्चे जंगल में बहुत दूर तक चले जाते हैं । चलते-चलते नेहा कि नज़र एक गुफा पर पड़ती है। “अरे देखो ! शायद वहाँ कोई गुफा है । ज़रूर उसमें कोई भयंकर जानवर रहता होगा । भास्कर ने कहा तुम भी बहुत भोली हो - अगर इस जंगल में कोई जानवर होता, तो वह अभी तक हमे खा नहीं लेता ! मुझे लगता है, उस गुफा में कोई नहीं रहता । हमे वहाँ जाकर कुछ देर आराम करना चाहिए ।”

आदित्य की बात सुनकर सभी बच्चे गुफा की तरफ बढ़ते हैं। जैसे ही वह गुफा के पास पहुंचते हैं, उन्हें सीताराम साधु मिलते हैं। बच्चों को जंगल में देखकर सीताराम हैरान रह जाते हैं । सीताराम बच्चो से कहते है  तुम सब कौन हो ? और इस जंगल में क्या कर रहे हो ?

उन बच्चो में से एक बच्चा अर्जुन बोलता प्रणाम महाराज ! हम पास के गाँव में रहते हैं और जंगल में घूमने आये हैं।
तो सीता राम गुस्से में कहता है  क्या तुम नहीं जानते कि यह जंगल कितना खतरनाक है?! तुम सबको यहां नहीं आना चाहिए था।


तभी भास्कर बोला !   खतरनाक..... पर हमे तो यह जंगल बिलकुल खतरनाक नहीं लग रहा। हाँ, अभी तक पूरे जंगल में हमे कोई जानवर भी नहीं दिखा । लगता है, जंगल में सिर्फ आप ही रहते हैं। सीताराम  कहते है नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है। इस जंगल में बहुत से खतरनाक जानवर रहते हैं, पर आज अमावस्या है, इसलिए सभी जानवर अपने-अपने घर में छुप गए हैं। सीताराम आस पास देखता है और बच्चो से कहता है चलो बच्चों, इससे पहले की शाकाल यहाँ आ जाये, जल्दी से गुफा के अंदर चलो।

यह सब देखकर बच्चे बहुत डर जाते हैं और साधु के साथ गुफा के अंदर चले जाते हैं। अर्जुन कहता है पर महाराज, यह अचानक हंसने की आवाज कहाँ से आ रही थी ? और यह शाकाल कौन है ? सीताराम  शाकाल एक राक्षस है, जो हर पच्चास साल में अमावस्या के दिन इस जंगल में आता है और जानवरों को खा जाता है। इसका मतलब शाकाल के डर की वजह से सभी जानवर छुप गए हैं। शायद तभी हमे इस जंगल में कोई जानवर नहीं दिखा।

सीताराम  तुमने बिलकुल सही समझा। शाकाल को जानवरों और इंसानों के बच्चों को खाना बहुत अच्छा लगता है तभी नेहा कहती है क्या…. इसका मतलब वो हमें भी खा जायेगा। मुझे बहुत डर लग रहा है। हमे इस जंगल में आना ही नहीं चाहिए था। साधु ने कहा नहीं-नहीं। तुम सबको डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। शाकाल तुम्हारा इस गुफा में कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

अर्जुन  मुझे इस शाकाल को देखना है, आखिर पता तो चले कि यह राक्षस दिखता कैसा है ? नहीं, वो बहुत खतरनाक है। वो तुम्हें नुक्सान भी पहुंचा सकता है। पर मैं उसे गुफा के अंदर से ही देखूँगा, जिससे वह मुझे देख ना सके अर्जुन ने ये साधु बाबा से कहा। मैं तुम्हें बाहर जाने की आज्ञा नहीं दे सकता।

साधु के बार-बार मना करने पर भी अर्जुन नहीं मानता और शाकाल को देखने के लिए चला जाता है। वह शाकाल को देखकर बहुत डर जाता है। वह देखता है, की एक चार हाथों वाला विशाल राक्षस पेड़-पौधों को तोड़ते हुए चला आ रहा है और साथ ही जंगली जानवरों को भी बहुत नुक्सान पहुंचा रहा है। यह देखकर अर्जुन जल्दी से गुफा के अंदर वापस जाता है। महाराज, ये शाकाल तो बहुत भयंकर है। इस तरह तो वह जंगल का विनाश कर देगा। क्या इसको भगाने का कोई उपाय नहीं है ?
सीताराम अर्जुन से कहते है नहीं, इससे  भगाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि वह एक राक्षस है। इसको भगाना हम इंसानों के बस की बात नहीं है।

भास्कर  पर महाराज  इसे यहाँ से भगाने का कोई तो रास्ता होगा ? सीताराम  हाँ में सिर हिलाकर कहता है हां एक उपाय है। यदि हम किसी तरह इस राक्षस को गुफा के अंदर ले आएं तो शायद हमें उससे छुटकारा मिल सकता है। नेहा कहती है पर  महाराज, इस गुफा में ऐसा क्या है!? सीताराम बताता है  इस गुफा में दिव्य शक्तियां हैं, जैसे ही राक्षस इनके पास आएगा वह भस्म हो जायेगा।

अर्जुन अगर ऐसी बात है, तो मैं अभी इस राक्षस को गुफा के अंदर ले आता हूँ।आदित्य अर्जुन से पूछता है लेकिन तुम ये सब करोगे कैसे ? अर्जुन यह सब तुम मुझपर छोड़ दो। ऐसा कहकर अर्जुन गुफा के बाहर चला जाता है और शाकाल के सामने जाकर खड़ा हो जाता है। शाकाल अर्जुन को देखक्र ख़ुशी से कहता है अरे वाह ! इंसानी बच्चा...... इसे खाने में तो बड़ा मज़ा आएगा। अर्जुन  तुम कौन हो और यहाँ क्यों आये हो ?

शाकाल  मैं हूँ शाकाल, पर किसी के बस में नहीं मेरा काल। खाने में पसंद हैं मुझे बच्चे, क्योंकि वह होते हैं मन के सच्चे। अच्छा, अगर ऐसी बात है, तो तुम मुझे खा सकते हो, पर पहले मैं आखिरी बार अपने दोस्तों से मिलना चाहता हूँ। क्या, दोस्त ? इसका मतलब यहाँ तुम्हारे अलावा और भी बच्चे हैं ? हाँ, वो यहीं सामने वाली गुफा में हैं। शाकाल कहता है तो चलो देरी किस बात की, मुझे जल्दी वहाँ ले चलो। मैं बहुत दिनों से भूखा हूँ।

अर्जुन ठीक है, तुम मेरे पीछे-पीछे आ जाओ और गुफा में आराम से बैठ कर सारे बच्चों को खा लो। ऐसा कहकर अर्जुन गुफा के अंदर जाने लगता है और शाकाल भी उसके पीछे-पीछे गुफा में जाने लगता है। जैसे ही शाकाल गुफा में प्रवेश करता है, दिव्य शक्तियों के प्रभाव से वह उसी समय भस्म हो जाता है। इस तरह अर्जुन, शाकाल का अंत करता है। साधु महाराज, अर्जुन की प्रशंसा करते हैं और सभी बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर वापस चले जाते हैं।

शिक्षा :-  हमें यह शिक्षा मिलती है कि हम अपनी सूझ - बूझ से किसी भी परेशानी का हल निकाल सकते हैं।

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8 April 2019

जिन्न और ऊंट

किसी जंगल में बहुत सारे जानवर रहते थे। सभी जानवर जंगल को साफ़ रखते थे और अपने-अपने काम को समय पर करते थे। उसी जंगल में एक शक्तिशाली जिन्न भी रहता था। जंगल के सभी जानवर बहुत चुस्त थे, पर ऊंट बहुत आलसी था। ऊंट जंगल के किसी भी काम को नहीं करता था। सभी जानवर ऊंट से बहुत परेशान थे। एक दिन शेर ने एक सभा का आयोजन किया। सभी जानवर वहाँ इकठ्ठा हुए। 

मैने तुम सबको यहाँ एक खास वजह से बुलाया है ऐसा शेर ने कहा, सभी जानवर शेर से पूछने लगे कैसी वजह महाराज ? तो शेर ने कहा  यह जंगल हमारा घर है। इसलिए आज से हम सभी जानवर जंगल के सारे काम मिलजुल कर करेंगे। उन्हें यह बात अच्छी लगी और उन्होंने अपने-अपने काम आपस में बाँट लिया।  

घोडा कहने लगा  हम सबने तो अपने-अपने काम बाँट लिए पर ऊंट को तो कोई काम मिला ही नहीं। इस पर ऊंट ने कहा  मैं जंगल के सभी कामों को करने में तुम सबकी सहायता करूँगा। घोड़े को ये बात ठीक लगी ! तुम जंगल के सभी जानवरों की सहायता करना। 

सभी जानवरों अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए। यह देख कर ऊंट एक घने पेड़ के नीचे बैठ गया । जब कोई जानवर उसे काम के लिए बोलता, तो वह काम करने से मना कर देता। बहुत दिन बीत जाने पर भी ऊंट ने किसी काम को करने में अपनी दिलचस्पी नहीं दिखाई । 

घोडा ऊंट से कहने लगा भाई ज़रा इस तालाब को साफ़ करने में मेरी सहायता कर दो। अरे ! यह काम तो तुम्हारा है। फिर मैं इसमें तुम्हारी सहायता क्यों करूँ ? यह कहते हुए ऊंट वहाँ से चला गया। रास्ते में उसे गधा मिला। गधा ऊंट से कहता है  भाई ! ज़रा इस बोझ को जंगल तक पहुंचाने में मेरी सहायता कर दो। नहीं नहीं, अगर मैं इतना बोझ उठाऊंगा, तो तुम्हारी तरह गधा नहीं बन जाऊंगा। 

  

गधे को ऊंट की यह बात बुरी लगी और उसने अकेले ही सारा बोझ जंगल तक पहुंचाया। ऊंट जंगल के बाहर जाने वाले रस्ते पर सो गया। तभी वहाँ जैकु कुत्ता आया। अरे ऊंट भाई उठो ! यह सोने का समय है क्या ? चलो मेरे साथ जंगल की देखभाल करो ।

इस पर ऊंट जैकु भाई, मैं बहुत थक गया हूँ। इसलिए मुझे थोड़ी देर सोने दो। थक गए हो ! पर तुम तो सारा दिन सोते ही रहते हो, फिर थक कैसे गए ? ऊंट को जैकु की बात बुरी लगी और वह मुँह बना कर वहाँ से चला गया । सभी जानवर ऊंट से परेशान हो गए थे । वह सभी दुखी हो कर जंगल के जिन्न के पास गए । जिन्न ने सबको एक साथ अपने पास देखकर कहा…  

अरे तुम सब एक साथ यहाँ ! सब ठीक तो है ? सभी जानवर कहने लगे सब ठीक है जिन्न भाई , बस हम सब तो ऊंट से परेशान हैं। 

जिन्न ने उनसे पूछा ऐसा क्या हुआ ? सभी जानवरों ने जिन्न को पूरी बात बताई और उससे निवेदन किया कि वह ऊंट को ऐसी सजा दे जिससे, उसे अपने आलस का एहसास हो जाये। अगर ऐसी बात है, तो मैं कोई तरकीब सोचता हूँ। 

कुछ देर बाद जिन्न को एक तरकीब सूझी, उसने अपने जादू से ऊंट की पीठ पर एक कूबड़ बना दिया । अगली सुबह जब ऊंट जंगल में घूमने आया तो सभी जानवरों ने उसका मज़ाक बनाते हुए कहा… । 

सभी जानवर ऊंट से कहते है,  भाई कल रात को कहीं पिटाई हुई है क्या ?  नहीं तो, ऐसा तो कुछ नहीं हुआ, फिर तुम सब ऐसे क्यों बोल रहे हो ? तभी शेर भी वहाँ आया और उसने ऊंट से पूछा । 

शेर कहता है  अरे ऊंट भाई तुम्हारी पीठ पर यह भदा सा कूबड़ कहाँ से आया, पहले तो इसे कभी नहीं देखा। ऊंट ने मुड़ के अपनी पीठ की तरफ देखा। वह बहुत दुखी हो गया और जिन्न के पास जाकर बोला…  

जिन्न भाई देखो यह मेरी पीठ पर क्या हो गया है। तुम इसे अपनी शक्ति से ठीक कर दो। यह बहुत भदा दिख रहा है।  मैं यह नहीं कर सकता ! क्योंकि यह भदा कूबड़ तुम्हें सज़ा के तौर पर दिया गया है। अब तुम आराम से सो सकते हो। 

तब से ले कर आज तक ऊंट की पीठ पर कूबड़ बना हुआ है। ऊंट अब इस बात को समझ गया की यह सब उसके आलस के कारण हुआ है और फिर वह सभी काम समय पर करने लगता है।  

शिक्षा : हमें यह शिक्षा मिलती है की हमे अपना काम समय पर करना चाहिए और कभी भी आलस नहीं करना चाहिए। 

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4 April 2019

घंटाघर का भूत

मुंबई के अँधेरी नामक शहर में लगभग 100 साल पुराना घंटाघर था। उस घंटाघर में एक नथु नाम का भूत रहता था। पूरा शहर दहशत में था। शहर के लोग उस घंटाघर के पास जाने से बहुत डरते थे। शहर में नथु का खौफ इस कदर फ़ैला हुआ था, की उस घंटाघर की रखवाली के लिए भी कोई राजी नहीं होता था। पूरे शहर में उसे भूतिया घंटाघर कहा जाता था। एक रात दूसरे शहर से आये अमर, तुषार और साहिल उस भूतिया घंटाघर के पास से गुज़र रहे थे। तभी साहिल कहता है - अरे देखो कितना बड़ा घंटाघर है।इसपर अमर बोलता है की हाँ, बड़ा तो है पर डरावना भी बहुत लगता है।

तभी तुषार हस्ते हुए अमर से कहता है की  क्या यार अमर, तुम इतना डरते क्यों हो ?
मैं बिलकुल नहीं डरता अमर ने तुषार से कहा,  बल्कि मैं तो इस घंटाघर के अंदर जाने के लिए बहुत एक्ससिटेड हूँ।अगर ऐसी बात है, तो फिर क्यों ना इसके अंदर चला जाए, थोड़ा आराम भी कर लेंगे।
हाँ, वैसे भी मैं तो बहुत थक गया हूँ, चलो जल्दी अंदर चलते हैं।

वह तीनों भूतिया घंटाघर के अंदर जाते हैं और देखते हैं की वहां चारों तरफ पत्ते पड़े हुए हैं। अचानक उस घंटाघर का दरवाज़ा अपने आप बंद हो जाता है। वह तीनों घबरा जाते हैं।
अमर डरकर कहता है अरे, यह दरवाज़ा अपने आप कैसे बंद हो गया ?

ऐसा कुछ नहीं है। शायद हो सकता है, कि यह दरवाज़ा आटोमेटिक हो साहिल अमर से कहता है। अच्छा ये बात है। मुझे तो लगा जैसे किसी भूत ने इसे बंद कर दिया हो।

तुषार  अमर से कहता है, अब तुम बिलकुल चुप हो जाओ। अगर तुमने एक और बार भूत का नाम लिया तो हम तुम्हें यहीं बंद करके चले जाएंगे। साहिल कहता है,  हाँ भूत जैसी कोई चीज़ नहीं होती। तभी पीछे से भूत की सिर्फ आवाज़ आती है भूत नहीं आता

भूत बच्चो से कहता है ऐसा किसने कहा ?

अमर डरकर कहता है यह कैसी आवाज़ थी ? तुषार कहीं तुम मुझे डराने कि कोशिश तो नहीं कर रहे हो ? तुषार कहता है  नहीं-नहीं ये आवाज़ मेरी नहीं थी।
इसका मतलब यहाँ हमारे आलावा कोई और भी है। तभी नथु भूत उन तीनों के सामने आता है। उसके बड़े-बड़े दांत और खूंखार आँखें देखकर तीनों बच्चे बहुत डर जाते हैं।

तुषार भूत से पूछता है तुम कौन हो ? कहीं दरवाज़ा तुमने तो बंद नहीं किया ?

भूत अपना परिचय देता है, मैं नथु हूँ। नथु भूत जो पिछले 50 साल से इस घंटाघर में कैद है। ये दरवाज़ा अपने आप बंद नहीं हुआ, ये तो मेरी जादुई शक्ति से बंद हुआ है। देखना चाहोगे मेरी जादुई शक्तियाँ !? नथु उन तीनों को डराने के लिए कभी अपने हाथ लम्बे करने लगता है, तो कभी उन्हें अपने बड़े-बड़े नाखूनों से डराने लगता है। यह सब देखकर साहिल और अमर बेहोश हो जाते हैं। नथु ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगता है।

तभी तुषार कहता है की तुमने यह ठीक नहीं किया, जल्दी से मेरे दोस्तों को ठीक कर दो, हमे घर भी जाना है। हम बहुत दूर से आये हैं।
 
यह सुन कर भूत बोलता है - अगर तुम लोग यहाँ से जाना चाहते हो तो पहले तुम्हें एक नक्शे के टुकड़ों को ढूंढ कर जोड़ना होगा। अगर तुम यह काम कर लोगे तो तुम आज़ाद हो जाओगे । मैं नक़्शे को जोड़ने वाले की एक इच्छा पूरी करूँगा और नक़्शे के पीछे छुपा रहस्य भी बताऊंगा।

तुषार भूत की यह बात सुनकर कहता है- पर इतने बड़े घंटाघर में, मैं उस नक़्शे के टुकड़ों को ढूंढूंगा कैसे ?

भूत तुषार से कहता है की वह उस नक़्शे के टुकड़ों को ढूंढ़ने के लिए उसे कुछ संकेत दे सकता है। भूत की यह बात सुनकर तुषार तैयार हो जाता है और कहता है की मैं पूरी कोशिश करूंगा  नक़्शे को ढूंढ कर जोड़ने की।

इसके बाद भूत तुषार को पहेली बताना शुरू करता है ,
         पहले दो टुकड़े मिलेंगे वहां।
         ख़त्म होता है रास्ता जहां ।

तुषार सोचते हुए बोलता है- जहाँ रास्ता खत्म होता है। इसका मतलब पहले दो टुकड़े सबसे ऊपर मिलेंगे, क्योंकि बाहर जाने का रास्ता तो बंद है।

तुषार सीढ़ियों से जल्दी-जल्दी ऊपर जाने लगता है। जैसे ही वो सबसे ऊपर पहुंचता है, उसे नक़्शे के पहले दो टुकड़े मिल जाते हैं। वो उन्हें लेकर वापस नीचे आता है। और भूत से कहता है , मुझे पहले दो टुकड़े मिल गए हैं, अब तुम मुझे आखरी दो टुकड़ों के बारे में बताओ।

भूत खुश हो कर तुषार से कहता है - बहुत अच्छे ! अब ज़रा ध्यान से सुनो।
         ऊपर आस्मां, नीचे ज़मीन।
         आखरी दो टुकड़े मिलेंगे वहां।
         जहाँ खिड़कियां होंगी तीन।

 
तुषार सोचने लगता है और सोचते- सोचते चारो तरफ नज़र घुमाते हुए बोलता है की यहाँ तो कहीं भी तीन खिड़कियां नहीं हैं चारों तरफ एक-एक ही खिड़की है।

तभी भूत तुषार से कहता है - ज़रा ध्यान से देखो, यह इतना आसान नहीं है। थोड़ा दिमाग का प्रयोग तो करना ही पड़ेगा।

तुषार एक बार फिर चारों तरफ नज़र घूमाता है। तभी उसे एक खिड़की नज़र आती है, जो तीन भागों में विभाजित होती है। तुषार जल्दी से खिड़की के पास जाता है और आखरी दोनों टुकड़ो को ले आता है। वह उन टुकड़ों को जोड़कर नक्शा तैयार कर देता है। और भूत से कहता है - ये लो नक्शा तैयार हो गया। मैं तुम्हारे द्वारा दिए गए काम में सफल हो गया।

भूत तुषार से कहता है - बहुत अच्छे ! चलो अब तुम जल्दी से एक इच्छा मांग लो। तुम्हारी जो भी इच्छा होगी उसे मैं  ज़रूर पूरा करूँगा।
तुषार नथु भूत से कहता है अगर ऐसी बात है, तो तुम मेरे दोनों दोस्तों को ठीक कर दो। और यहाँ से जाने दो। यही मेरी इच्छा है।

भूत तुषार से कहता है  इतनी जल्दी क्या है, पहले अपना इनाम तो ले लो।
तुम ये मुझे क्यों दे रहे हो, मैं इसका क्या करूँगा ? तुषार डरता हुआ बोला

नथु  ने एक ख़ज़ाने का नक्शा दिया । जिसकी कहानी उसने बच्चो को बताई  बहुत समय पहले जब मैं इस ख़ज़ाने को चोरी करने जा रहा था, तब एक संत ने इस नक़्शे को फाड़ कर मुझसे क्रोधित हो कर श्राप दिया था की “ जब तक कोई नेकदिल इंसान इस नक़्शे को नहीं जोड़ेगा तब तक मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी, इसलिए मरने के बाद भी मैं आज तक इस घंटाघर में भटक रहा हूँ ”। तुम ख़ज़ाने के असली हकदार हो, इसलिए इसे तुम रख लो।
तुषार नथु से बोलता है  इसका मतलब अब तुम्हें मुक्ति मिल जायेगी और पहले कि तरह लोग इस घंटाघर को देखने आ सकेंगे। नथु  हाँ तुमने सही कहा, चलो इससे पहले कि मेरा जाने का समय आये, मैं तुम्हारे दोस्तों को पहले जैसा कर देता हूँ।

नथु, तुषार के दोनों दोस्तों को ठीक कर देता है। तीनों दोस्त बहुत खुश होते हैं, तभी वहाँ एक रौशनी आती है और नथु उस रौशनी के साथ गायब हो जाता है। जैसे ही नथु गायब होता है, वैसे ही घंटाघर के दरवाज़ा खुल जाता है। वह तीनों वापस बाहर निकल कर ख़ुशी - ख़ुशी अपने घर चले जाते हैं और लोग एक बार फिर उस घंटाघर को देखने आने लगते हैं।   

शिक्षा :- हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें मुसीबत का हल होशियारी से निकालना चाहिए।

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