Tuesday, 26 December 2017

पंचतंत्र की कहानी - बुद्धिमान सियार और बेवक़ूफ़ चीता

किसी जंगल में एक सियार रहता था।  एक दिन वह भोजन के लिए जंगल में भटक रहा था की उसे मरा हुआ हाथी दिखाई दिया। उसने हाथी के मृत शरीर पर दांत गड़ाए लेकिन खाल मोटी होने की वजह से वह हाथी को चीरने में नाकाम रहा। तभी वहाँ से शेर गुजर रहा था | शेर को देखकर सियार के मन में विचार आया की क्यों ना हाथी की खाल चीरने में शेर की मदद ली जाए?!


सियार ने आगे बढ़कर शेर का स्वागत किया और हाथ जोड़कर कहा, “स्वामी, आपके लिए मैंने इस हाथी को मारा है। आप इसे खाकर मुझ पर उपकार कीजिए।” शेर ने थोड़ा सोचकर कहा, “मैं किसी दुसरे जानवर के द्वारा किये गए शिकार को नहीं खाता। इसे तुम ही खाओ।" शेर का जवाब सुनकर सियार परेशान हो गया। उसे समझ नहीं आया की हाथी को कैसे खाया जाए?

थोड़ी ही देर में उसे एक बाघ नजर आया। बाघ मरे हुए हाथी को देखकर बहुत खुश हुआ। सियार, बाघ की मंशा समझ गया और बोला, "इस हाथी का शिकार शेर ने किया है। मुझे इसकी रखवाली करनी है। एक बार किसी बाघ ने उसके शिकार को खा लिया था तब से शेर, बाघ जाति से नफरत करने लगा है। अगर शेर को पता चल गया की इसे तुमने खाया है, तो तुम्हे जिन्दा नहीं छोड़ेगा।" यह सुनते ही बाघ वहाँ से भाग खड़ा हुआ। 

सियार फिर से मरे हुए हाथी को खाने की तरकीब सोचने लगा। उसे एक चीता आता हुआ दिखाई दिया। सियार को पता था कि चीते के तेज नाखून और नुकीले दांत आसानी से हाथी की खाल को चीर सकते हैं। यह सोचकर उसने चीता से कहा, “चीता भाई, कहाँ जा रहे हो? लगता है आपने बहुत दिनों से कुछ खाया नहीं है। बहुत कमजोर लग रहे हो?” यह सुनकर चीते ने जवाब दिया, “हाँ भाई, बहुत दिनों से कुछ खाया नहीं है।”  ऐसा कहकर, चीते ने मरे हुए हाथी को देखा और सोचने लगा, "काश, यह मुझे खाने को मिल जाये।" 

सियार चीते से कहता है, “चीता भाई, इस हाथी का शिकार शेर ने किया है और मुझे इसकी रखवाली करने को कहा है। तुम चाहो तो इसमें से थोड़ा मांस खा सकते हो।" पहले तो चीते ने शेर के डर से मांस खाने से मना कर दिया, लेकिन सियार के ये कहने पर की जैसे ही शेर आएगा, वह उसे आगाह कर देगा, चीता राजी हो गया। 

चीते के तो जैसे खज़ाना हाथ लग गया। वह हाथी पर झपट पड़ा और उसने हाथी की खाल को चीर दिया। जैसे ही चीते ने हाथी की खाल को चीरा, सियार चिल्लाने लगा , “भागो, भागो। शेर आ रहा है।" यह सुनते ही चीता डर कर भाग गया और अपनी सूझ-बूझ से, सियार ने समस्या का हल निकाल लिया।

सारांश:- बुद्धि के प्रयोग से कठिन से कठिन कार्य भी आसानी से किये जा सकते हैं।

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Wednesday, 20 December 2017

पंचतंत्र की कहानी - नीला सियार

किसी जंगल में अनेक प्रजातियों के जानवर मिल-जुल कर रहते थे। एक दिन उनको ये बात पता चली की पास के ही जंगल से चंपू नाम का सियार उनके जंगल में घुस आया है। सभी जानवर जानते थे की वह सियार बदमाश और धूर्त है। तभी एक दिन भोला नाम का बन्दर सभा में,सभी को चम्पू सियार के बारे में बताता है और उससे बचकर रहने की सलाह देता है। कुछ दिन बाद,रात को जब सब जानवर सो रहे होते हैं, तब सियार शिकार के लिए बाहर निकलता है। सियार को देखकर जंगली कुत्ते उसके पीछे पड़ जाते हैं। चम्पू सियार भागकर पास के ही गाँव में किसी धोबी की झोपड़ी में घुस जाता है। 




वह, वहाँ पर रखे हुए नीले रंग से भरे बड़े से ड्रम में छिप जाता है। जंगली कुत्ते चम्पू को ढूंढ नहीं पाते और वापस जंगल चले जाते हैं। कुत्तों के डर से चम्पू रात भर ड्रम में ही छुपा रहता है। सुबह जब वह ड्रम से बाहर निकलता है, तो आईने में देखता है की वह पूरा नीला हो गया है। वह अपने आपको नीले रंग में रंगा देखकर बहुत खुश होता है। 

सियार एक योजना बना कर जंगल वापस जाता है। जब सारे जानवर चम्पू सियार को नीले रंग में देखते हैं तो उसे पहचान नहीं पाते और बहुत डर जाते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि यह अजीब सा जानवर कौन है? यह देख चम्पू सियार को बहुत मजा आता है और वह जंगल पर राज करने लगता है। जंगल के सभी जानवर दुखी होकर राजा शेर सिंह के पास पहुँचते हैं और नीले सियार का पूरा किस्सा सुनाते हैं। सब सुनने के बाद शेर, सियार से पूछता है की वह कौन है और कहाँ से आया है?

तब चम्पू सियार जवाब देता है की भगवान ने उन सब की रक्षा के लिए धरती पर भेजा है। यह सब सुनकर शेर भी सोच में पड़ जाता है लेकिन भगवान की बात सुनकर वह भी सियार को अपना राजा मान लेता है। सियार को अच्छा खाना और रहने को गुफा मिल जाती है। इस तरह उसके मौज के दिन बीतने लगते हैं। 

एक दिन वह सभी जानवरों के साथ बैठा होता है की उसे कुछ सियारों की आवाज़ें सुनाई देती हैं। चम्पू सियार, दुसरे सियारों की आवज सुनते ही मदहोश होकर उनकी तरह आवाज़ें निकालने लगता है। जैसे ही जानवर उसकी आवाज सुनते हैं तो उन्हें सारा माजरा समझ में आ जाता है। इसके बाद चम्पू सियार की जमकर धुनाई होती है और उसे जंगल से भगा दिया जाता है। 

सारांश: हमें कभी भी किसी को धोखा नहीं देना चाहिए और ना ही अपनी पहचान छुपानी चाहिए क्योंकि सच्चाई हमेशा सामने आ जाती है। 



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Wednesday, 13 December 2017

पंचतंत्र की कहानी - व्यापारी का पतन और उदय


वर्धमान नामक शहर में एक बहुत ही कुशल व्यापारी रहता था। राजा को उसकी क्षमताओं के बारे में पता था जिसके चलते राजा ने उसे राज्य का प्रशासक बना दिया। अपने कुशल तरीकों से व्यापारी ने राजा और आम आदमी को बहुत खुश रखा। कुछ समय के बाद व्यापारी ने अपनी लड़की का विवाह तय किया। इस उपलक्ष्य में उसने एक बहुत बड़े भोज का आयोजन किया। इस भोज में उसने राज परिवार से लेकर प्रजा तक सभी को आमंत्रित किया। राजघराने का एक सेवक, जो महल में झाड़ू लगाता था, वह भी इस भोज में शामिल हुआ। मगर गलती से वह एक ऐसी कुर्सी पर बैठ गया जो केवल राज परिवार के लिए रखी हुयी थी। सेवक को उस कुर्सी पर बैठा देखकर व्यापारी को गुस्सा आ जाता है और वह सेवक को दुत्कार कर वह वहाँ से भगा देता है। सेवक को बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है और वह व्यापारी को सबक सिखाने का प्रण लेता है।

अगले ही दिन सेवक राजा के कक्ष में झाड़ू लगा रहा होता है। वह राजा को अर्धनिद्रा में देख कर बड़बड़ाना शुरू करता है। वह बोलता है, “इस व्यापारी की इतनी मजाल की वह रानी के साथ दुर्व्यवहार करे। ” यह सुन कर राजा की नींद खुल जाती है और वह सेवक से पूछता है, "क्या यह वाकई में सच है? क्या तुमने व्यापारी को दुर्व्यवहार करते देखा है?" सेवक तुरंत राजा के चरण पकड़ता है और बोलता है, "मुझे माफ़ कर दीजिये, मैं कल रात को सो नहीं पाया। मेरी नींद पूरी नहीं होने के कारण कुछ भी बड़बड़ा रहा था।" यह सुनकर राजा सेवक को कुछ नहीं बोलता लेकिन उसके मन में शक पैदा हो जाता है।

उसी दिन से राजा व्यापारी के महल में निरंकुश घूमने पर पाबंदी लगा देता है और उसके अधिकार कम कर देता है। अगले दिन जब व्यापारी महल में आता है तो उसे संतरिया रोक देते हैं। यह देख कर व्यापारी बहुत आश्चर्य -चकित होता है। तभी वहीँ पर खड़ा हुआ सेवक मज़े लेते हुए बोलता है, "अरे संतरियों, जानते नहीं ये कौन हैं? ये बहुत प्रभावशाली व्यक्ति हैं जो तुम्हें बाहर भी फिंकवा सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसा इन्होने मेरे साथ अपने भोज में किया था। तनिक सावधान रहना।"

यह सुनते ही व्यापारी को सारा माजरा समझ में आ जाता है। वह सेवक से माफ़ी मांगता है और सेवक को अपने घर खाने पर बुलाता है। व्यापारी सेवक की खूब आव-भगत करता है। फिर वह बड़ी विनम्रता से भोज वाले दिन किये गए अपमान के लिए क्षमा मांगता है और बोलता है की उसने जो भी किया, गलत किया। सेवक बहुत खुश होता है और व्यापारी से बोलता है, "आप चिंता ना करें, मैं राजा से आपका खोया हुआ सम्मान आपको ज़रूर वापस दिलाउंगा।"

अगले दिन राजा के कक्ष में झाड़ू लगाते हुआ सेवक फिर से बड़बड़ाने लगता है, “हे भगवान, हमारा राजा तो इतना मूर्ख है कि वह गुसलखाने में खीरे खाता है।"  यह सुनकर राजा क्रोधित हो जाता है और बोलता है, “मूर्ख, तुम्हारी ये हिम्मत? तुम अगर मेरे कक्ष के सेवक ना होते, तो तुम्हें नौकरी से निकाल देता।" सेवक फिर राजा के चरणों में गिर जाता है और दुबारा कभी ना बड़बड़ाने की कसम खाता है।

राजा भी सोचता है कि जब यह मेरे बारे में इतनी गलत बातें बोल सकता है तो इसने व्यापारी के बारे में भी गलत बोला होगा। राजा सोचता है की उसने बेकार में व्यापारी को दंड दिया। अगले ही दिन राजा व्यापारी को महल में उसकी खोयी प्रतिष्ठा वापस दिला देता है।

सारांश: व्यक्ति बड़ा हो या छोटा, हमें हर किसी के साथ समान भाव से ही पेश आना चाहिए। 

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Wednesday, 6 December 2017

पंचतंत्र की कहानी - मूर्ख बुनकर


बहुत पुरानी बात है, किसी नगर में एक जुलाहा रहता था। वह दिन-रात कपड़े बुनकर अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। एक दिन जब वह कपड़े बुन रहा था, तभी उसके सभी उपकरण टूट गए। उन उपकरणों की मरम्मत के लिए उसे नयी लकड़ियों की आवश्यकता थी। वह लकड़ियाँ लेने जंगल में गया और एक वृक्ष को देखकर रुक गया। उस वृक्ष की लकड़ियाँ उपकरणों के लिये बिलकुल उपयुक्त थी। जैसे ही उसने लकड़ियाँ काटने के लिए अपनी कुल्हाड़ी उठायी, उसे किसी की आवाज़ सुनाई दी। 

उस आवाज़ को सुनकर वह रुक गया। परन्तु दूर-दूर तक उसे कोई नजर नहीं आया। जब वह पुनः लकड़ी काटने के लिए तत्पर हुआ, तभी वृक्ष से एक देव प्रकट हुए और जुलाहे से कहा - “मैं इस वृक्ष का देव हूँ। मैं सालों से इस वृक्ष पर आराम करता आया हूँ। तुम इसे क्यों काटना चाहते हो?" यह सुनकर जुलाहे ने जवाब दिया - “हे देव ! मैं एक जुलाहा हूँ और मेरे उपकरणों की मरम्मत के लिए इस वृक्ष कि लकड़ियाँ बिलकुल उपयुक्त है।"

यह सुनकर देव कहते हैं - “इस वृक्ष को मत काटो। तुम जो चाहो वरदान माँग सकते हो” वरदान की बात सुनकर वह अपनी पत्नी के साथ विचार-विमर्श करने के लिए देव से एक दिन का समय मांगता है देव से एक दिन का समय लेकर जुलाहा वापस अपने नगर आ जाता है। वह अपनी पत्नी को सारे घटनाक्रम को विस्तार से बताकर पूछता है कि उसे वरदान में क्या माँगना चाहिये?

उसकी पत्नी कहती है कि उसे दो हाथ और और दो सर माँग लेने चाहिये। जितने ज्यादा हाथ रहेंगे तुम उतने ज्यादा कपड़े बुन सकोगे। अगले दिन वह देव से दो हाथ और दो सर माँगता है। देव उसे दो हाथ और दो सर का वरदान देकर अन्तरध्यान हो जाते हैं। दो सर और चार हाथ हो जाने पर वह बहुत खुश होता है और अपने नगर की ओर चल देता है। नगरवासी जब उसे देखते है तो डर जाते है और उसे दो सर और चार हाथ वाला राक्षस समझकर उसकी खूब पिटायी करते हैं। 



सारांश - हमें कोई भी निर्णय लेने से पूर्व अच्छे से विचार कर लेना चाहिये।

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गरीब किसान

बहुत समय पहले की बात हैं किसी गाँव में एक अमीर साहूकार रहता था। उसे अपने पैसों पर बहुत घमंड था। एक दिन एक गरीब किसान उस साहूकार के पास मदद...