29 October 2018

भूतिया आईना

बहुत समय पहले, चंडीगढ़ में चार लोगों का एक परिवार रहता था। परिवार में अशोक, अशोक की पत्नी, और उनके दो बच्चे  थे - जिनका नाम चीकू और बबली था।अशोक को अपने परिवार के साथ शहर में आये कुछ ही समय हुआ था। लेकिन नए घर में आते ही अशोक की बेटी बबली का बर्ताव कुछ बदल सा गया था। बबली ज्यादातर या तो अकेले रहती थी, या फिर आईने के सामने बैठकर कुछ ना कुछ बोलती रहती थी।

यह देखकर उसकी मम्मी ने पूछा, “बबली, यूँ अकेले बैठ कर किस से बातें करती हो तुम?” इसपर बबली ने कहा, “मम्मी! मैं अपने एक दोस्त से बात करती हूँ, जो मेरे आईने में रहता है। वह मुझसे बहुत सारी बातें करता है। ऐसे ही दिन बीतते गए और बबली का व्यवहार सबसे अलग होता जा रहा था। उसे घर के हर आईने में कोई ना कोई दिखाई देता था, जिससे वो रोज बातें किया करती थी और उसे अपना दोस्त बताती थी।


अपनी बहन के बदलते व्यवहार को देखकर चीकू उसपर नज़र रखने लगा। कुछ दिनों के बाद, चीकू को बबली के कमरे में से अजीब सी आवाज़ें आने लगी। चीकू बबली के कमरे में गया और अंदर जाकर चारों तरफ देखने लगा । चीकू को आईने में एक परछाईं दिखी जिसे देखकर वह बुरी तरह घबरा गया। चीकू कमरे से भाग कर अपने मम्मी - पापा के पास गया।  

चीकू कुछ ना सुनते हुए अपने मम्मी - पापा को बबली के कमरे में ले गया। अशोक और उसकी पत्नी ने आईने में देखा, लेकिन उन्हें वहां अपनी परछाईं के अलावा और कुछ भी दिखाई नहीं दिया। वह गुस्से में चीकू से बोले, “ये सब क्या है, चीकू - ऐसा मज़ाक क्यों किया तुमने? तुम्हें शर्म आनी चाहिए। इतने बड़े हो गए हो और ऐसा मज़ाक! यह सब दोबारा नहीं होना चाहिये।

यह बोल कर वह दोनों चले गए और उनके जाते ही वह परछाईं आईने में फिर से वापस आ गयी। परछाईं ने अपनी भारी आवाज़ में चीकू से कहा, “क्या हुआ चीकू, मैं तुम्हें पसंद नहीं आयी क्या?” आवाज़ सुनते ही चीकू ने डर के पीछे देखा तो उसे वह परछाईं आईने में नज़र आयी। परछाईं देखते ही चीकू बहुत डर गया  और कमरे से भागने की कोशिश करने लगा लेकिन कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया। अपनी जान बचाने के लिए चीकू ने उस परछाईं की हाँ में हाँ मिला दी। 

यह सुनकर परछाईं ने चीकू को कमरे से जाने दिया। लेकिन उस दिन से चीकू को भी वह परछाईं घर के हर आईने में नज़र आने लगी। जिसकी वजह से चीकू बहुत ज्यादा डरने लगा। चीकू उस परछाईं से बचने के लिए घर से बाहर एक पार्क में चला गया। पार्क में चीकू को एक कोने में बबली बैठी हुए दिखी। चीकू बबली के पास जाकर बैठ गया। और उससे माफ़ी मांगने लगा। चीकू परछाईं से पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगा। 

घर जाकर चीकू और बबली एक आईने के सामने गए और जैसे ही उन्हें वह परछाईं नज़र आयी तो वह उस आईने को लेकर बबली के कमरे में चले गए। ऐसे ही एक-एक करते हुए वह घर के सारे आईने उस कमरे में ले गए। तभी उन आईनों में से परछाईं के चिल्लाने की आवाज़ आयी। परछाईं के चिल्लाने की आवाज़ अशोक और उसकी पत्नी को भी सुनाई देने लगी। वह दोनों भागते हुए बबली के कमरे में गए।

परछाईं दोबारा आईने में से बोली, “तुम सब मरने के लिए तैयार हो जाओ।” आईने में से परछाईं को बोलते देख मम्मी बेहोश हो गयी। तभी अशोक अपनी पत्नी और बच्चों को दूसरे कमरे में ले गया। थोड़ी देर में, अशोक की पत्नी के होश में आने के बाद बबली और चीकू ने अपने मम्मी-पापा को सारी बात बताई, जिसे सुनकर वह दोनों हैरान रह गए। उन्होंने फैसला किया कि वह लोग उस घर में नहीं रहेंगे।अशोक बबली के कमरे में रखे उन सब आईनों को वही लॉक करके उस घर को छोड़कर हमेशा के लिए अपने परिवार के साथ वहां से चले गए।

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23 October 2018

पंचतंत्र की कहानी - भूतिया पेड़

किसी जंगल में बहुत सारे जानवर मिल-जुल कर रहते थे। सभी जानवर एक दूसरे की बहुत सहायता करते थे। उसी जंगल में एक घना पेड़ था। सभी जानवर पेड़ से दूर रहते थे क्योंकि सबका यह मानना था कि उस पेड़ पर भूत रहता है। एक दिन, जंगल में रहने के लिए भालू आया, “मैं इस जंगल में आ तो गया मगर अपनी गुफा कहाँ बनाऊं?”

भालू चलते-चलते पेड़ के पास पहुंचा। भालू ने गुफा बनाने का काम शुरू कर दिया कि तभी वहां बंदर और हाथी आये और बोले, “अरे भालू भाई, तुम यहां अकेले क्या कर रहे हो?” इसपर भालू ने जवाब देते हुए कहा, “मैं यहां रहने के लिए गुफा बना रहा हूँ।” बंदर ने कहा, “पर इस पेड़ पर भूत रहता है। तुम मेरे घर के नीचे अपनी गुफा बना लो, वहां तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी।  

तीनों वहाँ से चले जाते हैं। भालू ने अपनी गुफा ठीक उसी पेड़ के नीचे बनाई जिस पेड़ पर बंदर रहता था। भालू निश्चिंत होकर वहां रहने लगा। एक दिन भालू जंगल में घूमने के लिए निकला, घूमते-घूमते भालू उसी पेड़ के नीचे जा पहुँचा। भालू ने कहा, “अगर इस पेड़ पर भूत रहता है तो वह मुझे इतने दिन से दिखाई क्यों नहीं दिया ? मुझे लगता है यहां ज़रूर कुछ गड़बड़ है।”


भालू के ऐसा कहते ही पेड़ के ऊपर से आवाज़ आयी, “तुम यहां आ तो गए हो पर जा नहीं पाओगे, आज रात मैं तुम्हें खा लूँगा।” भालू डरकर वहां से भाग गया। गुफा में पहुंच कर भालू ने बंदर को बुलाया, “बंदर भइया, मैने अभी भूत देखा, वहीं उसी पेड़ के नीचे।” इसपर बंदर ने चौंकते हुए कहा, “क्या… भूत ! मैने तुम्हें वहां अकेले जाने से मना किया था। तुम अभी इस जंगल में नए हो, वो भूत बहुत खतरनाक है। उसने पहले भी बहुत जानवरों को नुक्सान पहुंचाया है।” 

भालू अब उस पेड़ के पास कभी अकेला नहीं जाता था। एक दिन भालू को जंगल में गोरिल्ला दिखा। भालू उसके पीछे चल पड़ा। कुछ दूर जाने के बाद भालू ने देखा की गोरिल्ला उसी पेड़ पर चढ़ गया जिस पेड़ पर भूत रहता था। भालू बंदर के पास गया, “बंदर भाई, मैने अभी-अभी एक गोरिल्ले को भूत वाले पेड़ पर चढ़ते हुए देखा, शायद वह इस जंगल में नया है। 

बंदर ने कहा, “पर गोरिल्ला को तो उसकी दुष्टता के कारण काफी समय पहले इस जंगल से निकाल दिया था।”
बंदर सोच में पड़ गया। वह ये समझ गया, की पेड़ के भूत के पीछे कोई गहरा राज़ छुपा था। बंदर रात को भूत का पता लगाने गया। उसने देखा कि, गोरिल्ला ही भूत बनकर जानवरों को डराता था। बंदर को थोड़ा सोचने के बाद एक तरकीब सूझी। वह पास के पेड़ पर छुपकर चिल्लाने लगा, “बहुत दिनों के बाद किसी गोरिल्ले की खुशबू आ रही है। आज तो पेट भरकर खाऊंगा और यह गोरिल्ला तो मुझे देख भी नहीं सकता क्योंकि मैं तो भूत हूँ।” 

गोरिल्ला यह सब सुनकर डर गया, उसने सभी जंगल के जानवरों को इकट्ठा किया। गोरिल्ला ने उन्हें सारी बात बता दी। बंदर अभी भी उसी तरह से चिल्लाया, “आज तो गोरिल्ले का माँस खा कर ही पेट भरूंगा। इसपर शेर ने कहा, “पर भूत तो इस पेड़ पर रहता था, फिर आवाज़ इस पेड़ से कैसे आ रही है?!” 

गोरिल्ला बोला, “महाराज पेड़ पर कोई भूत नहीं रहता, आपने मुझे जंगल से निकाल दिया था इसलिए मैं इस पेड़ पर आप सब से छुप कर रहता था। सभी जानवरों को मैं ही भूत बनकर डराता हूँ, जिससे कोई यहां मुझे देख ना सके। लेकिन अब यहां सचमुच का भूत आ गया है।” ये सब सुनते ही बंदर नीचे आ गया और उसने सबको बताया, “यहां कोई भूत नहीं रहता, पेड़ पर रहने वाले भूत का सच सामने लाने के लिए ही मैं भूत बनकर इसे डरा रहा था, ठीक वैसे ही जैसे इसने हम सबको डराया था।’ 

गोरिल्ले का झूठ पकड़ा गया और उसे जंगल से बाहर निकाल दिया गया। इस तरह सभी जानवरों को पेड़ के भूत से छुटकारा मिल गया। वह सब ख़ुशी, से बिना डरे जंगल में रहने लगे।    

शिक्षा -  हमें डर का सामना बहादुरी से करना चाहिए।
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17 October 2018

नैतिक कहानियाँ - जादुई चश्मा

किसी गाँव में एक गरीब किसान अपने परिवार के साथ रहता था। वह दिन रात मेहनत करके किसी तरह अपने परिवार का गुजारा करता था। किसान के परिवार मे उसकी पत्नी कमला और बेटा राधे उसके साथ रहते थे । एक दिन किसान ने अपने बेटे राधे से बोला, “बेटा राधे, तुम्हारी माँ बाज़ार गयी है और मैं खेतों में बीज बोने जा रहा हूँ , इसीलिए तुम  घर पर ही रहना क्योंकि आजकल गांव मे बहुत चोरियाँ हो रही हैं।” इसपर राधे ने कहा, “ठीक है पिता जी आप निश्चिंत हो कर जाइए मैं कहीं नहीं जाऊँगा।” 

किसान ने खेत पहुँचकर खेत की खुदाई शुरू की। तभी उसे फावड़े के किसी धातु से टकराने की आवाज़ सुनाई दी उसने मिट्टी हटाकर देखा तो उसे एक चमकता हुआ डिब्बा दिखाई दिया । किसान ने उस डिब्बे को बाहर निकालकर देखा। किसान ने सोचा, “अरे वाह ! ऐसा लगता है इसमें ज़रुर कोई ख़ज़ाना होगा।” यह सोच कर किसान ने जैसे ही डिब्बे को खोलकर देखा, वह उदास हो गया और उसने कहा, “अरे ! यह तो बस एक बेकार सा चश्मा है। मेरी तो सारी मेहनत बेकार हो गई।”

यह सोच कर किसान ने उस चश्मे को वहीं छोड़ दिया और अपना काम करने लगा। थोड़ी देर बाद राधे वहां आया और खेत की रख वाली करने लगा। किसान भी वही पेड़ के निचे लेट कर सोचने लगा, “क्यों ना इस चश्मे को लगा कर देखा जाये ! कम से कम इस धुप से तो आराम मिलेगा।” 


किसान ने चश्मा लगा कर अपने बेटे की तरफ देखा और उसे कुछ जंगली जानवर अपने बेटे पर हमला करते हुए नज़र आये। उसने जल्दी से चश्मा उतार दिया।  

किसान ने दोबारा चश्मा लगाया और राधे की तरफ देखा, उसे दोबारा वही दिखा जो उसने पहले देखा था। किसान को समझ आ गया कि यह कोई साधारण चश्मा नहीं बल्कि जादुई चश्मा है। किसान ने जल्दी से चश्मा उतारा और राधे के पास जाकर बोला, “बेटा राधे तुम जल्दी घर जाओ, यहां सारा काम में खुद कर लूँगा, कल से खेत का सारा काम तुम्हें ही करना है। इसलिए आज तुम सिर्फ आराम करो।”

ये सुनकर राधे घर चला गया । किसान को समझ आ गया कि यह कोई साधारण चश्मा नहीं बल्कि एक जादुई चश्मा है। जिसे पहन कर वह सबका निकट भविष्य देख सकता है। किसान बहुत खुश हुआ। 

किसान काम छोड़ कर गांव में घूमने निकल गया। वह गाँव के लोगों का भविष्य देखता और उन्हें ऐसा कोई काम नहीं करने देता जिससे उन्हें कोई नुक्सान हो। गाँव के सभी लोग उसकी बहुत तारीफ करने लगे। एक दिन उसे अपना पुराना दोस्त ललन मिला।  

किसान चश्मा लगाकर ललन को देखने लगा। उसने देखा कि ललन को एक व्यापारी जल्द ही बहुत सारा धन देने वाला है, इतना देखते ही किसान के मन में लालच आ गया और उसने आधा भविष्य देख कर ही चश्मा निकाल दिया। किसान ने सोचा, “क्यों ना में ललन को उसके रास्ते से भटका कर खुद उस व्यापारी से सारा धन ले लूँ।” 

यह सोचकर किसान ललन के पास गया और पूछा, “कैसे हो ललन भाई और इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हो ? ललन ने कहा, “मैं ठीक हूँ भाई! बस जरा बाजार तक जा रहा था। इसपर किसान ने कहा, “बाजार ! लेकिन आज तो बाजार बंद है। मैं अभी बाजार से ही आ रहा हूँ। वहां आज किसी व्यापारी की दुकान में आग लग गई है इसलिए आज बाजार बंद है।” ललन ने जवाब देते हुए कहा, “अच्छा! फिर तो आज बाजार जाना बेकार है।”
यह बोल-कर ललन अपने घर चला गया और किसान पैसों के लालच में बाजार चला गया। बाजार पहुंचते ही किसान को अपना एक व्यापारी मित्र मिला, जिसने उसे पैसों से भरा एक बैग देते हुए बोला, “अरे भाई ! अच्छा हुआ तुम मुझे मिल गये, क्या तुम मेरा यह बैग अपने पास रख सकते हो क्योंकि मैं कुछ दिन के लिए दूर विदेश जा रहा हूँ और मैं ऐसे ही किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकता तो क्या मेरे वापस आने तक तुम मेरे बैग का ध्यान रख लोगे ?  

किसान ने सोचा, “वाह ! मैं इस बैग को लेकर बहुत अमीर हो जाऊँगा और व्यापारी मित्र के वापस आने तक अपना घर भी बदल दूँगा। इस से यह मुझे दोबारा कभी ढूंढ भी नहीं पायेगा।” इतना सोचकर किसान ने बोला, “मित्र तुम निश्चिंत हो कर विदेश जाओ, मैं इस बैग का अच्छे से ध्यान रखूँगा।” 

यह कहते हुए किसान ने बैग ले लिया और व्यापारी वहां से चला गया। तभी वहां भागते हुए एक और व्यापारी आया और किसान को जोर से पकड़कर बोला, “तुमने मेरा बैग चुराया, अब तुम्हारी खेर नहीं।   

अब व्यापारी ने किसान को बहुत मारा और उसे बोलने तक मौका दिए बिना बैग को अपने साथ लेकर चला गया । अब किसान को समझ आ गया कि वह पैसों से भरा बैग चोरी का था और उसके मित्र ने उसे धोखा दिया था।  किसान को अब अपने किये पर बहुत पछतावा हुआ। 

शिक्षा- हमे कभी भी किसी चीज़ का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। 
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11 October 2018

यमराज के दूत

बहुत समय पहले की बात है एक गाँव में राधेलाल और श्यामलाल नाम के दो मूर्तिकार रहते थे। दोनों ही बेहद सुंदर मूर्तियाँ बनाते थे, लेकिन उन दोनों में से राधेलाल गाँव में अपने काम के लिए ज्यादा मशहूर था। राधेलाल ऐसी मूर्तियाँ बनाता था जिन्हें देखकर लोगो को उन मूर्तियों के जीवित होने का भ्रम हो जाता था व आस - पास के गाँव में भी राधेलाल की मूर्तियों के बहुत चर्चे थे।

राधेलाल अपनी मूर्तिकार पर बहुत घमंड करता था और एक दिन उसी घमंड में उसने गाँव में एक घोषणा की, “मैं सबसे सुंदर मूर्तियाँ बनाता हूँ क्या इस गाँव या आस - पास के गाँव में कोई भी मूर्तिकार ऐसा हैं जो मेरे से अच्छी मूर्ति बना सकता हैं। अगर कोई ऐसा हैं तो मुझसे मूर्ति बनाने की प्रतियोगिता करे और अगर उसकी मूर्ति मुझसे बेहतर व सुंदर हुई तो मैं उसे एक थैली सोने के सिक्के दूँगा”

राधेलाल की यह बात सुन के गाँव का दूसरा मूर्तिकार श्यामलाल बोला, “मैं बनाऊंगा तुमसे अच्छी मूर्ति, बताओ कब करनी हैं प्रतियोगिता मैं तैयार हूँ।” अगले दिन सुबह वह दोनों मूर्तिकार अपने - अपने औजारों के साथ गाँव के मैदान पर पहुँच गए, जहाँ गाँव वालो ने पहले से दो बड़े पत्थर रखे हुए थे। अब उन दोनों ने मूर्तियाँ बनाने की प्रतियोगिता आरम्भ करी और कुछ समय बीत जाने के बाद दोनों की मूर्तियाँ बन के तैयार हो गयी।


उन दोनों ने ही सुंदर मूर्ति बनाई, लेकिन सबसे अच्छी और सुंदर मूर्ति राधेलाल ने बनाई थी । जिसके बाद राधेलाल ने अपने घमंड में बोला, “मैंने पहले ही कहा था की इस पूरे गाँव में मुझसे अच्छा मूर्तिकार कोई भी नहीं हैं और अब तो यह साबित भी हो गया हैं। मैं ही यहाँ सबसे समृद्ध और सबसे अच्छा मूर्तिकार हूँ। इसपर श्यामलाल ने कहा, “ इतना घमंड अच्छा नहीं होता हैं राधेलाल किसी दिन तुम्हारा यह घमंड तुम्हें ले डूबेगा।”

राधेलाल अपने घमंड  में श्यामलाल की बात को नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ गया। वह और भी ज्यादा घमंड से भरा हुआ रहने लगा। ऐसे ही कुछ समय बीत गया। एक दिन राधेलाल बहुत बीमार पड़ गया था। उसे लगने लगा की उसकी मृत्यु नज़दीक आ गयी व वह ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह पाएगा।

तब उसने एक तरकीब सोची और यमदूतों को भ्रमित करने के लिए उसने हुबहू अपने जैसी कुछ मूर्तियाँ बनाई और खुद उन मूर्तियों के बीच जा कर खड़ा हो गया। जब यमदूत उसे लेने आए तो एक जैसी इतनी आकृतियों को देखकर दंग रह गए और पहचान न पाये की उन मूर्तियों में से असली मनुष्य कौन हैं और सोचने लगे, “यहाँ तो एक जैसी दिखने वाली ग्यारह आकृतियाँ हैं। इसमें से असली कौन हैं और नकली कौन कैसे पहचान की जाये ?”

थोड़ी देर सोचने के बाद भी जब यमदूत को कुछ समझ नहीं आया तो वह फिर सोचने लगे, “अगर आज, मैं मूर्तिकार के प्राण नहीं ले सका तो यमलोक का नियम टूट जाएगा और अगर सत्य परखने के लिए मैंने इन मूर्तियों को तोड़ा तो कला का अपमान हो जाएगा। आखिर करूँ तो क्या करूँ?”

तभी अचानक यमदूत को मानव स्वभाव के सबसे बड़े दुर्गुण अहंकार व घमंड का विचार आया। उसी को परखने के लिये वह मूर्तियों को देखते हुए बोले, “कितनी सुन्दर मूर्तियाँ बनी हैं यह सभी, लेकिन मूर्तियों में एक त्रुटी हैं। काश मूर्ति बनाने वाला मेरे सामने होता, तो में उसे बता पाता की उस से यह मूर्ति बनाने में क्या गलती हुई हैं।”

यह सुनते ही राधेलाल मूर्तिकार का अहंकार जाग उठा, और वह अपने मन में सोचने लगा, “मैंने अपना पूरा जीवन मूर्तियाँ बनाने में समर्पित कर दिया। भला मेरी मूर्तियों में क्या त्रुटी हो सकती हैं।” और यह सोचते ही वह बोल उठा, “कैसी त्रुटी??” इसपर यमदूत बोले, “बस यही त्रुटी हुई तुमसे की तुम अपने अहंकार में बोल उठे क्योंकि बेजान मूर्तियाँ कभी बोला नहीं करती।” यह बोल कर यमदूत राधेलाल को अपने साथ ले गए और राधेलाल को अपने घमंड और अहंकार पर बहुत अफसोस हुआ।

शिक्षा- हमें कभी भी अपनी काबिलियत या कला का घमंड व अहंकार नहीं करना चाहिये।
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8 October 2018

पंचतंत्र की कहानी - चतुर कौआ

किन्नू नाम के जंगल में बहुत सारे जानवर मिलजुल कर रहते थे। उन्ही जानवरों में एक लोमड़ी भी थी। लोमड़ी की चतुराई के क़िस्से पूरे जंगल में प्रसिद्ध थे और सभी जानवर उससे बहुत सावधान रहते थे। क्योंकि लोमड़ी बहुत बूढ़ी हो गयी थी, इसलिए वह शिकार नहीं कर पा रही थी। जंगल में बहुत घूमने के बाद भी लोमड़ी को कोई शिकार नहीं मिला। वह बहुत थक गयी।

तभी उसकी नज़र थोड़ी दूरी पर एक कछुए पर पड़ी। कछुए को देखते ही लोमड़ी के मुंह में पानी आ गया और वह सोचने लगी, “अरे वाह! आज तो मैं इस कछुए को खाकर ही अपनी भूख मिटाऊँगी। पर मैं इसे पकड़ूँ कैसे? शिकार करने की ताक़त तो मुझ मे बची ही नहीं है। अगर मैं इसके पास गयी तो ये भाग जाएगा। लोमड़ी को एक तरकीब सूझी वह कछुए के पास गयी और बोली, “अरे कछुए भाई ! कैसे हो? बहुत दिनों के बाद दिखे। कहाँ रहते हो आजकल ? मैंने शाम को जंगल में रहने वाले सभी जानवरों के लिए दावत रखी है।  मैं चाहती हूँ कि तुम भी दावत में ज़रूर आओ।


यह सुनकर कछुआ मान गया। कछुआ दावत में जाने से पहले अपने दोस्त कौए के पास गया। कछुए को देखते ही कौआ बोला, “और दोस्त आज कैसे आना हुआ ?” कछुआ बहुत खुश होकर बोला, “आज सुबह मुझे लोमड़ी बहन मिली थी और उन्होंने मुझे दावत पर अपने घर बुलाया है।  उन्होंने मुझे कहा था कि वह सबको दावत का निमंत्र्ण दे रही है।  तो मैंने सोचा तुमसे मिलता हुआ जाऊँ। अगर उन्होंने तुम्हें निमंत्र्ण दिया हो तो दोनों साथ चलेंगे।

इसपर कौवे ने कहा, “ मुझे तो कोई निमंत्र्ण नहीं मिला  … लेकिन।” कछुआ कौवे कि बात सुने बगैर ही चला गया।  कुछ देर के बाद, वह लोमड़ी कि गुफा में पहुंचा और उसने लोमड़ी से पूछा, “अरे! बहन यहाँ तो कोई नहीं दिखाई दे रहा। इसपर लोमड़ी ने कहा, “तुम सही समय पर आये हो। मैं इसी समय भोजन करती हूँ। ऐसा कहकर लोमड़ी ने कछुए को अपने पंजों से दबोच लिया। 

कछुए की मजबूत ढाल होने के कारण लोमड़ी उसे मार नहीं पा रही थी। यह देखकर लोमड़ी उदास हो गयी। कछुए को समझ नहीं आ रहा था वो क्या करे ? वह तो लोमड़ी पर भरोसा करके उसके घर आया था। वह बहुत डर गया था।  तभी कौआ गुफा के अंदर आया और लोमड़ी से कहा, “लोमड़ी बहन, तुम इसे ऐसे नहीं खा पाओगी।  यदि तुम इसे खाना चाहती हो तो कुछ देर के लिए इस कछुए को तालाब में डाल दो जिससे इसकी खाल नरम पड़ जाएगी और तुम इसे आसानी से खा पाओगी। 

इसपर लोमड़ी ने कहा, “वो तो ठीक है, लेकिन तुम मेरी मदद क्यों कर रहे हो ? कौवे ने कहा, “वो इसलिए क्योंकि मैंने बहुत समय से स्वादिष्ट माँस नहीं खाया है । तुम्हारे साथ मैं भी इस कछुए का माँस चख लूँगा। तुम्हारा भी फायदा, मेरा भी फायदा। लोमड़ी कौवे के कहने पर कछुए को तालाब के किनारे जाकर पानी में छोड़ देती है। धीरे-धीरे कछुवा तैरता हुआ तालाब के बीच में पहुँच जाता है।

कौवा हँसते हुए लोमड़ी से कहता है, “हा! हा! हा! क्या हुआ लोमड़ी बहन? कैसा लगा धोखा खा कर? मुझे उम्मीद है कि अब दोबारा तुम किसी के साथ ऐसा करने के बारे में नहीं सोचोगी। इतना सुनकर लोमड़ी कछुए का पीछा करते-करते तालाब के बीच पहुंच जाती है। इतने में एक मगरमच्छ आता है और लोमड़ी को दबोच ले जाता है।

इस तरह, कौवा कछुवे की लोमड़ी से जान बचाता है और लोमड़ी अपनी धूर्ता के कारण मारी जाती है।
 
शिक्षा - हमें मुसीबत के समय हमेशा सूझ-बुझ से काम करना चाहिए। 
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3 October 2018

नैतिक कहानियाँ - जादुई पेंसिल

बहुत समय पहले किसी गाँव में सुन्दर नाम का एक आदमी रहता था। सुन्दर एक बहुत अच्छा चित्र्कार था। जब एक दिन खाना बनाने के लिए सुन्दर जंगल में लकड़ियाँ काटने जा रहा था। तभी उसकी नज़र एक चमकदार चीज़ पर पड़ी और बोला, “ये इतनी चमकदार चीज़ क्या है?” यह सोचकर सुन्दर उस चमकदार चीज़ के पास गया, और उसने उस चमकने वाली चीज़ को उठाकर बोला, “अरे ! यह तो बस एक पेंसिल हैं। पर ये इतनी चमक क्यों रही है?”

सुन्दर थोड़ी देर उस चमकने वाली पेंसिल को निहारता रहा। तभी उसे याद आया की उसे खाना बनाने के लिए लकड़ियाँ काटने जाना था। वह उस पेंसिल को अपने साथ लेकर वहाँ से चला गया। जब सुन्दर शाम को घर आया तो उसने देखा की अभी भी उस पेंसिल की चमक वैसे की वैसे ही थी। 

सुन्दर ने उस पेंसिल का इस्तेमाल किया, और उस पेंसिल से उसने चित्र्कारी करना शुरू कर दिया। सबसे पहले उसने एक सेब बनाया, और जैसे ही उस कागज़ पर सेब बन गया वह सेब उसकी आँखों के सामने असलियत में आ गया। जिसे देखकर सुन्दर एक दम हक्का-बक्का रह गया। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था, फिर उसने दोबारा उस पेंसिल से एक कुल्हाड़ी बनाई। वह कुल्हाड़ी भी उसके सामने प्रकट हो गयी। सुन्दर को यकीन हो गया था, की यह एक जादुई पेंसिल है।  


उस पेंसिल को पाकर सुन्दर बहुत खुश हो गया था। अब उस पेंसिल के ज़रिये सुन्दर ने अपनी ज़रूरतों का सारा सामान बना लिया था । ऐसे ही करते-करते अब उसके पास हर एशो आराम की चीज़े थीं, जिसके बाद वह आराम का जीवन बिताने लगा। तभी एक दिन सुन्दर ने सोचा, “मैंने तो अपनी ज़रुरत की सारी चीज़े पा ली, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो अपनी ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाते होंगे। क्यों ना मैं उनकी मदद करूँ !” 

सुन्दर यह सोच ही रहा था की तभी उसे याद आया की उसका एक दोस्त, जो दूसरे गाँव में रहता हैं। जिसके पिताजी का स्वास्थ्य बहुत ख़राब रहता हैं। सुन्दर ने सोचा, “क्यों ना मैं अपने दोस्त की मदद कर दू।” सुन्दर अगली सुबह अपने दोस्त सोहन से मिलने चला गया। वो दोनों एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश हुए।   

सुन्दर ने अपने दोस्त सोहन को भरोसा दिलाने के लिए उस जादुई पेंसिल से एक आम बनाया, और वह आम उन लोगो के सामने आ गया। यह देखकर सोहन हैरान रह गया था।  उसके बाद, सुन्दर सोहन की मदद करने लगा। सोहन की ज़रूरतों का सारा सामान उस पेंसिल के ज़रिये बना दिया। और उसकी मदद करके वहाँ से चला गया। 

धीरे-धीरे कर के सुन्दर हर उस इंसान की जरूरते पूरी करता था, जिसे मदद की जरूरत होती थी। ऐसा करते-करते वो पूरे गाँव में मशहूर हो गया। एक दिन गाँव के कुछ लोग सुन्दर की जादुई पेंसिल के बारे में आपस में बात कर रहे थे की तभी वहाँ खड़े हुए एक आदमी ने सब कुछ सुन लिया और उसने सोचा, “अरे वाह ! ये जादुई पेंसिल अगर मुझे मिल जाए तो मैं अमीर हो जाऊँगा।”

एक दिन किसी काम से सुन्दर कही जा रहा था। तभी उस आदमी ने सुन्दर का अपहरण कर लिया। वो सुन्दर को अपने घर ले गया। उस आदमी ने सुंदर से सोने का पहाड़ बनाने को कहा। सुन्दर ने एक सोने का पहाड़ बना दिया, लेकिन उसने पहाड़ के साथ-साथ एक बहुत लंबी नहर भी बनाई। पहाड़ देखकर वो आदमी बहुत खुश हो गया, और उसने सुन्दर से उसकी जादुई पेंसिल छीन ली। जैसे ही वो नाव की तरफ जा रहा था उससे जादुई पेंसिल गिर गई।  पर वो आदमी इतना खुश था की उसे कुछ पता नहीं चला लेकिन सुन्दर ने वो जादुई पेंसिल गिरते हुए देख ली। जैसे ही वो आदमी नहर के बीच में पहुंचा, सुन्दर ने जल्दी से पेंसिल उठाई और नहर में लंबी-लंबी लहरों को बना दिया। और वो आदमी लहरों में बह गया। 

तो इस तरह सुन्दर ने अपनी जादुई पेंसिल को गलत हाथों में जाने से बचा लिया। 

शिक्षा - अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके बड़ी से बड़ी मुसीबतों से निकला जा सकता है।    

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