25 October 2017

पंचतंत्र की कहानी - बोलने वाली गुफा


किसी जंगल में एक शेर रहता था। वह शिकार की तलाश में भटक रहा था कि उसे एक गुफा नजर आई। उसने सोचा गुफा में कोई ना कोई जानवर जरुर होगा। यह सोचकर वह गुफा के अंदर चला गया लेकिन उसे कोई जानवर नजर नहीं आया। फिर वह गुफा के अंदर बैठकर जानवर के आने का इंतजार करने लगा। उस गुफा का मालिक एक सियार था जो शिकार की तलाश में गया हुआ था। जब सियार भी जंगल की खाक छानकर थक गया तो वह वापस अपनी गुफा की ओर चल पड़ा। गुफा की ओर जाते हुए सियार ने किसी जानवर के पैरों के निशान देखे जो गुफा के अंदर तक जा रहे थे। यह देखकर सियार ने सोचा किअभी गुफा के अंदर जाना ठीक नहीं होगा।

सियार बहुत चालाक और बुद्धिमान था। गुफा में कोई जानवर है या नहीं, यह जानने के लिए उसने एक तरकीब निकाली। सियार ने गुफा से बातें करना शुरू कर दिया। सियार ने जोर से आवाज लगाई - "ऐ मेरी गुफा, आज तू इतनी उदास क्यों है? लगता है तेरा मेरे बिना मन नहीं लग रहा था। आज तू बहुत चुप है, वरना तू मेरे आने पर कभी इतनी शांत नहीं रहती।"

सियार की बात सुनकर शेर सोचता है कि शायद यह गुफा कुछ बोलकर सियार का स्वागत करती होगी। आज उसके वहां होने से शायद वह डर गई है और बात नहीं कर रही। शेर, गुफा बनकर उस सियार की बातों का जवाब दे देता है। अंदर से शेर की आवाज सुनकर सियार वहाँ से तुरंत भाग जाता है और शेर उसका इंतजार करता रह जाता है।

सारांश: हमें सदैव अपने विवेक से काम लेना चाहिए।

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18 October 2017

पंचतंत्र की कहानी - शत्रु का शत्रु मित्र


बहुत समय की बात है, किसी गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। उसके परिवार में कोई नहीं था। वह शिव भगवान् कि पूजा पाठ में पूरा दिन बिताया करता था।  एक दिन वो किसी परिवार के घर पूजा के लिए गया, तो उसे दक्षिणा में दो बैल मिले। ब्राह्मण सोचने लगा कि इन बैलो का भरण-पोषण कौन करेगा? उसके खुद का रहने और खाने का ठिकाना नहीं हैं, तो वह इन बैलो का क्या करेगा? इन्हें क्या खिलायेगा? लेकिन वह उन लोगो को बैल स्वीकारने से मना भी नहीं कर सकता था। अब तो उसे बैलों को घर ले जाना ही पड़ेगा। क्या पता भगवान् शिव ने उसे वह बैल अपनी सेवा के लिए दियें हों?! यह सोचकर ब्राह्मण बैलों को अपने घर ले जाता है।

फिर वह उन बैलो की देखभाल ऐसे करने लगा कि जैसे शिव भगवान् की पूजा करता हो| उनका भरन-पोषण ब्राह्मण दक्षिणा में मांग-मांग कर करने लगा। ब्राह्मण एक दिन सोचने लगा है कि जब से ये बैल मेरे जीवन में आए हैं तब से मुझे अकेलापन महसूस ही नहीं होता। इनके सहारे तो में सारी ज़िन्दगी काट लूँगा, लेकिन किसी दिन अगर ये बैल चले गए तो मेरा क्या होगा? इनके बिना मैं कैसे जिऊँगा? इनके बिना मेरा है ही कौन?

एक दिन उस गाँव में चोर आ जाता है और उसकी नजर उन बैलों पर पड़ती है। चोर बोलता है कि वाह कितने सुन्दर बैल हैं। लेकिन यह ब्राह्मण के साधारण से घर में ये क्या कर रहे हैं? इन्हें तो मेरे पास होना चाहिए। वैसे भी ब्राह्मण उन बैलो को क्या खिलाता होगा? मैं इन्हें अपने घर ले जाऊँगा। यह सोचकर चोर उस ब्राह्मण के घर के सामने से चला जाता है और चोरी करने की योजना बनाता है। रास्ते में उसे एक राक्षस मिल जाता है। चर उसे देखकर थोड़ा घबरा जाता है और पूछता है की तुम कोन हो? राक्षस उसे कहता है की वह ब्रह्म राक्षस है और उस ब्राह्मण को खाने जा रहा है। | चोर ने कहता है की वह एक चोर है और ब्राह्मण के घर बैलों की चोरी करने जा रहा है।

फिर राक्षस और चोर योजना बना कर एक साथ ब्राह्मण के घर चले जाते हैं। ब्राह्मण के घर पहुँच कर राक्षस, चोर से कहता है की देखो मित्र, अभी ब्राह्मण सोया है। क्यों न मैं इसे मारकर खा लूं? अगर ये जग गया तो मैं इसे मार नहीं पाऊँगा और तुम बैल बाद में चुरा लेना। तभी चोर जवाब देता है की मित्र, तुम इसे बाद में खा लेना। पहले मैं बैल चुरा लेता हूँ। अगर ये जग गया तो मै बैल नहीं चुरा पाऊँगा।

इस तरह से दोनों में बहस हो जाती है और फिर उनकी लड़ाई कि जोर-जोर की आवाजों से ब्राह्मण जग जाता है और दोनों के पीछे डंडा लेकर भागता है। ब्राह्मण के हाथ में डंडा देखकर वह दोनों भी डर कर भाग जाते हैं।


 सारांश - जल्दबाजी में किया गया काम हमेशा खराब होता है। 

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11 October 2017

पंचतंत्र की कहानी - लालच बुरी बला है



किसी गाँव में एक किसान रहता था। गाँव में सभी की फसलें अच्छी होती थीं, लेकिन उसकी फसल इतनी अच्छी नहीं होती थी। फसल अच्छी न होने के कारण वह बहुत परेशान रहता था, क्योंकि उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह खेती के लिए उन्नत बीज और बढ़िया औजार खरीद सकें। 

एक दिन किसान अपनें खेत में ही सो जाता है। अगले दिन सुबह जब वह उठता है तो उसे अपनें खेत के पास एक साँप नजर आता है। यह देखकर किसान मन ही मन सोचता है कि हो-न-हो यही मेरे खेत के देवता हैं। मैंने इनकी पूजा नहीं की है, इसीलिए मेरी फसल अच्छी नहीं हो रही है। 

यह विचार मन में आते ही वह घर जाकर एक कटोरी दूध ले आता है और साँप के सामने रख कर घर चला जाता है। अगले दिन जब वह खेत में वापस आता है तो उसे कटोरी में दूध कि जगह एक स्वर्ण मुद्रा मिलती है।  इस तरह किसान हर रोज साँप के लिए दूध लाने लगा और साँप भी उसे प्रतिदिन एक स्वर्ण मुद्रा देने लगा। 

एक दिन किसान का बेटा, उसको ऐसा करते हुए देख लेता है। तब किसान का बेटा उससे पूछता है कि , पापा आप साँप को दूध क्यों पिला रहें हैं। किसान अपने बेटे से कहता है कि, यह साँप ही अपने खेत के देंवता है और यह दूध पिलाने से काटतें नहीं बल्कि स्वर्ण मुद्रा देते है। 

उस दिन से किसान का बेटा भी प्रतिदिन साँप को दूध पिलाने लगा और साँप भी उसे हर रोज एक स्वर्ण मुद्रा देने लगा। यह देख किसान का बेटा सोचता है कि मैं इसके लिये हर रोज दूध ले कर आता हूँ और यह केवल एक ही स्वर्ण मुद्रा देता है, और इस तरह उसके मन में लालच आ जाता है और सोचता है कि क्यों न इस साँप से सारी स्वर्ण मुद्रायें एक साथ ही ले ली जाये?!

अगले दिन जब किसान का बेटा साँप के लिए दूध लेकर आता है तो साँप को अपने सामने देख वह उसे छड़ी से मारने लगता है।  साँप भी गुस्से में उसे काट लेता है और किसान का बेटा वहीँ मर जाता है। 



सारांश: हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए। 


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