28 September 2017

पंचतंत्र की कहानी - चुहिया बनी दुल्हन


गंगा नदी के तट पर एक साधू अपनी पत्नी के साथ रहते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। एक दिन साधू जब तप कर रहे थे, एक बाज वहां से गुजर रहा था और उसके पंजे में एक चुहिया फंसी हुई थी। जब बाज़ साधू के ऊपर से गुज़रा तो वह चुहिया उसके पंजो से छुटकर नीचे साधू की गोद में गिरी जिससे साधू की आँख खुल गई। घायल चुहिया को देखकर साधू को बहुत दया आयी। साधू ने मंत्र पढ़कर चुहिया को एक बच्ची का रूप दिया और अपनी पत्नी को सौंप दिया। वह पत्नी को बच्ची सौंपते हुए बोले,"प्रिय हमारी कोई संतान नहीं है। मैं जानता हूँ तुम संतान सुख चाहती हो।आज से इसे ही अपनी संतान समझो।" साधू की पत्नी बच्ची को पाकर बहुत खुश हुई।

कई साल बीत गए और वह बच्ची बड़ी होकर एक सुन्दर युवती में तब्दील हो गई। अब साधू अपनी बेटी के लिए उपयुक्त वर ढूंढने लगे। साधू अपनी बेटी का हाथ किसी साधारण मनुष्य के हाथ में नहीं देना चाहते थे। साधू ने सूर्य देव का ध्यान करके सूर्य देव को बुलाया। अगले ही पल सूर्य देव प्रकट हो गए। साधू बोले, "बेटी, ये सूर्य देव हैं। क्या तुम इनसे विवाह करना पसंद करोगी?" लड़की ने जवाब दिया, "नहीं पिताजी! ये बहुत गर्म हैं। मैं इनसे विवाह नहीं कर सकती। इनके साथ तो मेरा रहना मुश्किल हो जाएगा।"

फिर साधू ने वरुण देव को बुलाया और कहा, "बेटी, ये वरुण देव हैं। क्या तुम इनसे विवाह करोगी?" बच्ची ने फिर उतर दिया, "नहीं पिताजी! इनसे भी मैं विवाह नहीं करूंगी। ये बहुत ठन्डे हैं।" साधू ने फिर पवन देव का मंत्र पढ़ा और उन्हें आने का निमंत्रण दिया। पवन देव के आने के बाद साधू ने लड़की से फिरसे विवाह का प्रश्न किया। लड़की ने उनसे भी विवाह करने से मना कर दिया। जवाब सुनकर पवन देव हंसने लगे और साधु से कहा, "आपको पर्वत देवता के पास जाना चाहिए।"

पर्वत देवता के पास जा कर भी लड़की ने उनसे विवाह करने से भी मना कर दिया और यह कहा की वह बहुत कठोर हैं। साधू ने पर्वत देवता से पुछा, "आप ही बताइए कि अब क्या किया जाये?" पर्वत देवता ने कहा, "आप एक चूहे से इस कन्या का विवाह करें। उसमे इतनी क्षमता है कि वह मुझे भी खोकला कर दे।" साधू ने तुरंत ही चूहे को निमंत्रण दिया। चूहा प्रकट हुआ और फिर साधू की बेटी उसे देखकर खुश हो गयी। वह साधु से बोली,"पिताजी, मुझे ये वर पसंद है। आप मेरा विवाह इससे ही करें।" और फिर साधू ने अपनी बेटी को एक चुहिया में बदल दिया और उसका विवाह उस चूहे के साथ किया।

सारांश- किसी के स्वरूप को बदलना आसान नहीं होता।


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18 September 2017

पंचतंत्र की कहानी - बन गया शेर


बहुत समय पहले की बात है। एक आश्रम में चार मित्र ऋषि से विभिन्न तरह कि विद्या प्राप्त कर रहे थे | ऋषि ने उन चारों को कई तरह के यज्ञों को सम्पन्न करने का ज्ञान दिया। जब उन चारों की शिक्षा समाप्त हुई तो वे अपने घर जाने के लिए ऋषि से आज्ञा लेने जाते हैं। ऋषि उन चारों को बोलते हैं, "मुझे तुम्हे जो सिखाना था, वो मैंने सिखा दिया। अब तुम अपने विवेक से अपनी विद्या का इस्तेमाल करना।" ऋषि से आशीर्वाद लेकर वो चारों अपने गाँव के लिए रवाना होते हैं। 

रास्ते में वह एक घने जंगल से गुजरते हैं। वहां उन्हें एक शेर का कंकाल नजर आता है। उन चारों में से एक मित्र बोलता है, “मित्रो, मैंने जो ज्ञान गुरूजी से प्राप्त किया है, उससे इस शेर के कंकाल की हड्डियों को मैं एक कर सकता हूँ।"  इससे पहले कि कोई कुछ कह पाता, वह मंत्र पढ़कर उस कंकाल को एक कर देता है। यह देखकर बाकी तीनो मित्र हैरानी से एक-दुसरे को देखते हैं और खुश होते हैं।

दूसरा मित्र भी बोल पड़ता है, "मित्रो, मुझे एक ऐसा मंत्र आता है जिससे मैं इस कंकाल के अंगो का निर्माण कर सकता हूँ।" यह बोलते ही वह एक मंत्र पढता है और पलक झपकते ही शेर के सारे अंगो का निर्माण हो जाता है। यह देखते ही तीसरा मित्र कहता है, "मित्रो, मैं भी एक ऐसा मंत्र जानता हूँ जिससे इसमें प्राण फूंके जा सकते हैं।" ये बात सुनते ही चौथा मित्र बोलता है, "मित्रो, ऐसा कदापि मत करना। अगर तुमने इस शेर को जीवित कर दिया तो ये शेर हम सबको मार कर खा जाएगा।"

चौथे मित्र की यह बात सुनकर बाकी तीनो मित्र हंसने लगते हैं। उन तीनो में से एक मित्र बोलता है, "यह कायर है। इसे ना तो विद्या आती है और ना ही ये हिम्मत रखता है।" चौथा मित्र फिर से उन तीनों को चेताता है, "मित्रो, अगर तुम्हे मेरी बात नहीं माननी तो मत मानो। पर कम से कम मुझे पेड़ पर तो चढ़ने दो।"

इतना बोलते ही वह पेड़ पर चढ़ जाता है। तीसरा मित्र मंत्र पढना शुरू करता है। जैसे ही मंत्र खत्म होता है, शेर जीवित हो जाता है। तुरंत ही वह उन तीनो पर दौड़ता है और उन्हें मारकर खा लेता है। उन्हें खाने के बाद वह चला जाता है उसके जाते ही चौथा दोस्त पेड़ से उतरता है और कहता है, "काश तुमने मेरी बात मान ली होती।" फिर वह अकेला ही अपने घर की ओर चल पड़ता है।

सारांश - “हमें कभी भी अपने ज्ञान का गलत इस्तेमाल नहीं करना चाहिए!!”


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4 September 2017

पंचतंत्र की कहानी - कछुआ और हंस

एक घने जंगल में एक कछुआ और दो हंस रहते थे| तीनों ही गहरे मित्र थे| तीनो का वक़्त एक-दुसरे के साथ खेलते और बात करते हुए कब बीत जाता, पता ही नहीं चलता था|

एक दिन कछुआ, हंसों से कहता है कि मित्र काश मैं भी तुम्हारी तरह उड़ पाता, काश मेरे भी पंख होते, तभी हंस भी उससे कहता है की काश हमारी पीठ पर भी तुम्हारी तरह ही कोई मजबूत ढाल होती तो हमें भी शिकारियों का सामना नहीं करना पड़ता और हम आराम से उड़ सकते थे|

एक बार जंगल में आकाल पड़ गया और जंगल के सभी जानवर वहां से जाने लगे| इसलिए हंसों ने भी सोचा कि वो भी वहां से चले जाएंगे| ये बात वो कछूए को बताने के लिए उसके पास जाते हैं और उससे कहते हैं, कि हम जंगल छोड़ कर जा रहे हैं तुम अपना ख्याल रखना|


कछुआ उनकी ये बात सुनकर रोने लगता है और उनसे कहता है कि मित्रों तुमने मुझसे ये बात कहकर मुझे बहुत दुखी किया है| मैं अकाल में तो रह सकता हूँ लेकिन अकेलेपन का शिकार नहीं बन सकता, इस दुनिया में मेरा तुम्हारे सिवाए है ही कौन? अगर तुम साथ होते तो कितना मजा आता और वो कछुआ उनको ये बात कहकर रोने लगता है|

हंस भी उसकी ये बात सुनकर रोने लगते हैं और उससे कहते हैं, तुम्ही बताओ मित्र हम क्या करे? अगर हम इस जंगल में रहे तो हम जीवित नहीं रह पाएंगे| अगर हम यहाँ से जाते हैं तो तुम्हे छोड़कर जाना होगा | अगर तुम्हे भी उड़ना आता तो हम तुम्हे अपने साथ ले चलते, पर शायद हमारा भाग्य यही चाहता है कि हम एक दुसरे से बिछड़ जाएँ| यह सुनकर कछूए के दिमाग में एक तरकीब आती है और वो कहता है मित्रो मैं भले ही तुम्हारी तरह न उड़ सकूं लेकिन तुम्हारे साथ तो उड़ सकता हूँ| तुम एक लकड़ी के दोनों किनारों को अपनी- अपनी चौंच में पकड लेना और मैं उसे बीच में से अपने मुंह से पकड़ लेता हूँ|

कछुआ जल्दी ही एक लकड़ी लेकर आता है और उसे हंसों को पकड़ाता है| उसके बाद वो दोनों हंस उसके छोर को पकड़ लेते हैं और फिर कछुआ उस लकड़ी को बीच में से पकड़ लेता है| जिससे वो तीनों एक साथ उस जंगल को छोड़ दुसरे जंगल कि ओर चले जाते हैं|

रास्ते में एक गाँव आता है और उस गाँव में कुछ आदमी उड़ते हुए कछुए को देखकर हैरान हो जाते हैं कि, तभी उनमे से एक आदमी कहता है लगता है ये हंस एक मरे हुए कछुए को ले जा रहे हैं और फिर ये सुनते ही वो कछुआ कुछ बोलने के लिए जैसे ही मुँह खोलता है , वह लकड़ी उसके मुँह से छुट जाती है और वो निचे गिर जाता है और उंचाई से गिरने पर उसकी मौत हो जाती है|

तो दोस्तों इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि हमें कभी भी आवेश में आकर नहीं बोलना चाहिए और खुद पर नियंत्रण रखना चाहिए!!


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