28 September 2018

नैतिक कहानियाँ - बप्पा का जादुई मोती

डेरावाल नगर में आशीष नाम का एक डरपोक बच्चा रहता था। वह रोज़ाना भगवान गणेश की पूजा करता था। आशीष किसी भी काम को करने से पहले ही हार मान लेता था जिसके कारण स्कूल के सभी बच्चे उसे छेड़ते और उसका मज़ाक बनाते थे। एक दिन आशीष ने अपने स्कूल में होने वाली रेस प्रतियोगिता में भाग लिया । तभी उसके दोस्त सार्थक ने उससे कहा, “तुम इसमें भाग ना लो तो अच्छा होगा, ये कोई बच्चों की प्रतियोगिता नहीं है। वैसे भी मुझे तुम जैसे डरपोक को हराने में कुछ मज़ा नहीं आएगा।”

आशीष ने अपने दोस्त सार्थक की बात सुनकर प्रतियोगिता से अपना नाम वापिस ले लिया और घर पहुँचकर सोचने लगा, “कल से मैं स्कूल ही नहीं जाऊँगा। इससे कोई मेरा मज़ाक भी नहीं बनाएगा और ना मुझे कोई छेड़ेगा।” यह सोचकर आशीष सो गया और सोते हुए उसने सपने में भगवान गणेश को देखा । वह देखता है कि भगवान गणेश उसे एक जादुई मोती देते हैं। 


जादुई मोती देकर गणेश जी गायब हो गए और आशीष ने उठकर देखा कि वहां एक मोती पड़ा हुआ है जो उसे सपने में गणेश जी ने दिया था। ये देखकर आशीष बहुत खुश हुआ। उसने मोती को अपनी जेब में रखा और शाम को पार्क में अपने दोस्तों के साथ खेलने के लिए गया, तभी एक कुत्ता आशीष के पीछे पड़ गया। ये देखकर आशीष डर कर भागने लगा और चिल्लाया । भागते-भागते उसे याद आया की उसके पास जादुई मोती है इसलिए उसे डरने की कोई जरुरत नहीं है। वह रुक गया और कुत्ते की तरफ देखकर बोला, “चल भाग… ! भाग यहां से।” कुत्ता डरकर भाग गया।

अगले दिन आशीष स्कूल पहुंचा। स्कूल में जब उसके शिक्षक ने उसे सवाल हल करने के लिए बुलाया तो सार्थक बोला, “आशीष से यह सवाल हल नहीं हो सकता, वैसे भी उससे आज तक कोई काम हुआ है क्या !” पहले तो आशीष बहुत घबरा गया, फिर आशीष ने सोचा, “मुझे घबराने की क्या जरुरत मेरे पास तो जादुई मोती है। मेरे लिए तो हर काम आसान है।” यह सोचकर आशीष ने सवाल आराम से हल कर लिया । सभी बच्चे ये देख के हैरान थे कि आशीष ने सवाल कैसे हल कर लिया।

उसका शिक्षक खुश होकर बोला, “अरे वाह ! मैं बहुत खुश हूँ कि तुमने इतना मुश्किल सवाल बिना डरे इतनी आसानी से हल कर लिया।” अब आशीष हर काम आसानी से कर लेता था। क्योंकि उसके पास एक जादुई मोती था। इसलिए आशीष ने स्कूल में होने वाली रेस प्रतियोगिता में अपना नाम दोबारा दर्ज़ करवा लिया। एक दिन उसके दोस्त अंश ने उससे पूछा, “यार आशीष पहले तो तुम कोई काम ठीक से नहीं कर पाते थे और बहुत घबरा भी जाते थे फिर अचानक तुम्हारे अंदर इतना आत्मविश्वास कैसे आया ?”

आशीष अपनी जेब से मोती निकालते हुए बोला, “ये सब तो इस जादुई मोती का कमाल है इस मोती के कारण ही तो मैं सारे काम आसानी से कर लेता हूँ।” अंश ने हैरानी से कहा, “जादुई मोती… ! ये तुम्हें कहाँ से मिला ? क्या तुम मुझे ये मोती एक दिन के लिए दे सकते हो ?” अंश के बहुत बार बोलने पर भी आशीष ने वो मोती उसे नहीं दिया । 

एक दिन अंश को वो मोती स्कूल के मैदान में पड़ा हुआ मिला। अंश ने मोती को उठाकर सोचा, “शायद आशीष से यह मोती गिर गया है क्यों ना मैं इस मोती को अपने पास रख लूँ ।” अंश ने उस मोती को अपने पास रख लिया । कुछ दिनों के बाद जब स्कूल में रेस प्रतियोगिता हुई तो आशीष जीत गया। यह देखकर वहां मौजूद सभी लोग दंग रह गए। और अंश ने आशीष से पूछा, “आशीष भाई ! तुमने यह रेस कैसे जीती ? तुम अभी भी अपने सारे काम बिना घबराये कैसे कर रहे हो ?” इसपर आशीष ने कहा, “तुम भूल गए क्या ? मेरे पास जादुई मोती है।” 

इसपर अंश ने जवाब दिया, “पर वो मोती तो कुछ दिनों से मेरे पास है। इसका मतलब तुमने मुझसे झूठ कहा की ये जादुई मोती है।” यह पूरी बात उनके पीछे खड़ा शिक्षक सुन लेता है और बोलता है, “बहुत खूब आशीष बेटा, तुमने रेस जीत ली और ये सब किसी मोती का नहीं बल्कि तुम्हारे अंदर जागे हुए आत्मविश्वास का कमाल है। यह सुनकर आशीष हैरान हो गया और उसे समझ आ गया कि वह कोई जादुई मोती नहीं है और वह हर काम को इसलिए आसानी से कर लेता है क्योंकि अब उसका आत्मविश्वास जाग गया था । 
शिक्षा - हर काम को आत्मविश्वास से करें तो कोई भी काम मुश्किल नहीं है। 
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19 September 2018

भुक्खड़ चूहा

कुछ समय पहले की बात हैं। एक गाँव में चूहों का एक परिवार रहता था। उन चूहों में से एक चूहा ऐसा भी था जिसे खाने की बहुत बुरी आदत थी, वह पूरा समय बस खाता और सोता रहता था।वह इतना खाता था लेकिन फिर भी उसे संतुष्टि नहीं होती थी।उसकी इस आदत से उसके परिवार वाले भी परेशान रहते थे। एक दिन सुबह कूकू चूहे के दोस्त का जन्मदिन था । और उसका दोस्त उसे जन्मदिन पर न्यौता देने आया ।  

अब अगले दिन कूकू चूहा पार्टी में गया, और वहाँ जाकर भी वह अपनी भूख पर काबू नहीं कर पाया। और सारा केक  मेहमानों के आने से पहले ही खा गया। यह देखकर सब कूकू चूहे पर बहुत गुस्सा हो गए , और उसे पार्टी से जाने को कहने लगे। अब निराश होकर कूकू चूहा वापस अपने घर को निकल गया, मगर इन सब के बाद भी कूकू चूहे के खाने की आदत में कोई परिवर्तन नहीं आया। 

अगले दिन कूकू चूहे का एक दोस्त उसे खेतों में बुलाने के लिए आया । कूकू चूहा और पिंटू चूहा अपने बाकि सभी दोस्तों के साथ खेत में चले गए । खेत में जाकर वह फ़सलों पर टूट पड़ा ।  सभी ने जल्दी-जल्दी खाना खा लिया, लेकिन भुक्खड़ चूहे का पेट नहीं भरा । यह देखकर उसका दोस्त पिंटू चूहा उससे बोला, “अरे ! जल्दी खा ना हमें जाना भी हैं।” यह सुनकर कूकू चूहा बोला , “अरे ! रुक ना इतनी भी क्या जल्दी हैं ? अभी पेट भर कर खाने दें और एक लंबी सी डकार लेने दे। फिर हम चलेंगे। 


ऐसा कहकर कूकू चूहा और खाने लगा पर पिंटू चूहा फिर से बोला, “ अरे! जल्दी करना। इतने में सभी चूहों में भगदड़ मच गयी। चूहे चिल्लाने लगे, “भागों! भागों! बिल्ली आ गयी!!” सारे चूहे तेज़ी से भागने लगे, मगर भुक्खड़ चूहा बहुत धीरे-धीरे चल रहा था। क्योंकि बहुत ज़्यादा खाने की वजह से वह भाग नहीं पा रहा था। और वह अपने दोस्तों से कहने लगा, “मेरे लिए रुको !”

इतने में कूकू चूहे का पैर कही पर फँस गया। कूकू चूहा फटाफट अपना पैर निकालने लगा। यह देखकर बिल्ली धीरे-धीरे उसके पास आ रही थी और बोली, “हीहीही अब तुझे मुझसे कौन बचाएगा। आज तो मेरी दावत हो गयी।”
इतने में कूकू चूहे का पैर निकल गया फिर लंगड़ाते - लंगड़ाते कूकू चूहा जैसे तैसे भागने लगा। फिर बिल्ली भी एक दम से उसके पीछे भागने लगी लेकिन थोड़ी ही देर में उसका घर आ गया और वो बोला, “उफ़! बच गया !”

ऐसा सोचकर अब कूकू चूहा धीरे- धीरे चलने लगा था। उतनी देर में वो बिल्ली दौड़ कर आ गयी । बाकि चूहे अभी तक अपने-अपने घर में घुस गए थे । लेकिन कूकू चूहा पीछे रह गया, वो जैसे ही घर में घुसने लगा। तो वह दरवाज़े में ही अटक गया … क्योंकि खा-खाकर उसका पेट इतना मोटा हो गया था कि वह अब अपने ही घर में घुस नहीं पा रहा था…अब अंदर से सभी चूहे उसे घर के अंदर खींचने लगे और बाहर से बिल्ली उसकी पूछ पकड़कर उसे बाहर खींचने लगी ।

यह देखकर कूकू चूहा चिल्लाने लगा, और रोने लगा लेकिन बिल्ली ने उसकी पूछ नहीं छोड़ी व आखिर में उसकी पूछ ही कट गयी । और बिल्ली धड़ाम से पीछे गिर गयी । सभी चूहों ने जैसे-तैसे कूकू चूहे को अंदर खींच लिया ।

इस घटना के बाद कूकू चूहे को अपनी गलती का एहसास हुआ, और अब उसने खाने का लालच छोड़ दिया  । 

शिक्षा - किसी भी चीज़ की अति हमेशा नुकसानदायक होती हैं। 

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17 September 2018

बातूनी कौवा

किसी जंगल में कालिया नाम का एक कौवा रहता था। कालिया बहुत बातूनी था। वो हमेशा किसी ना किसी बात पर बोलता रहता, “अब मुझे जंगल की सारी समझ तो है नहीं, लेकिन समझ होने या ना होने से क्या फर्क पड़ता है? क्योंकि जिनको समझ है... उनको सही समझ है... इसकी किसको समझ है?” उसकी इस आदत से जंगल के जानवर और पक्षी बहुत तंग रहते थे। जैसे ही वो बोलना शुरू करता था सब अपने कान पकड़ लेते थे। एक दिन कालिया की इतना ज़्यादा बोलने की आदत से तंग आकर काजल कोयल ने चांदनी कबूतर से कहा, “काजल इस कालिया को चुप कराने के लिए हमें कुछ करना चाहिए”|  

इसपर काजल कुछ देर सोचकर बोली, “तुम मेरे साथ चलो”| चांदनी और काजल उड़ती हुई जंगल के राजा शेर की गुफा पर पहुंची। उन्होंने देखा कि शेर अपनी गुफा के बाहर सो रहा है। काजल चुपके से गुफा के अंदर चली गई| कुछ देर बाद वो एक शाही चिठ्ठी और कलम के साथ बाहर आई और चांदनी को वो चिठ्ठी दिखाते हुए बोली, “ये देखो... शाही चिठ्ठी| इसके इस्तेमाल से हम उस बातूनी कालिये को हमेशा के लिए चुप करा सकते हैं”|


काजल और चांदनी वहाँ से उड़े और कालिया के घोंसले से थोड़ी दूर ज़मीन पर आकर रुक गए, काजल ने कलम से उस शाही कागज पर कालिया के लिए एक चिठ्ठी लिखी और वो दोनों कालिया के पास पहुंचे| और काजल बोली, “कालिया, महाराज ने तुम्हारे लिए एक चिठ्ठी भेजी है”| ये सुनकर कालिया बोला “ओह! सच में? पर अगर महाराज को किसी सलाह की ज़रुरत है तो मैं तुम्हें पहले ही बता दूँ कि कोई मुझसे सलाह मांगता है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है, लेकिन किसी को सलाह देना मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता| क्योंकि तुम तो जानती हो किसी को सलाह देने से पहले उसकी पूरी बात सुननी पड़ती है, और उसकी बात सुनने के लिए चुप रहना पड़ता है, और मुझसे चुप कहाँ रहा जाता है. इसलिए अगर…” 

काजल उसे रोकते हुए बोली, ”हम सब जानते हैं, तुमसे चुप नहीं रहा जाता! तुम पहले महाराज की चिठ्ठी तो पढ़ लो!” कालिया ने चिट्ठी पढ़ी जिसमे लिखा था, “मुझे शिकायत मिली है कि तुम बहुत ज़्यादा बोलते हो| तुम्हारे ज़्यादा बोलने की वजह से जंगल के सभी पक्षी और जानवर बहुत तंग रहते हैं| इसलिए मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि आज के बाद तुम चुप रहोगे और कुछ नहीं बोलोगे”| 

चिट्ठी पढ़कर कालिया बहुत दुखी हुआ| अब वो हमेशा चुप रहने लगा| उसका बोलने का बहुत मन करता था लेकिन महाराज के डर की वजह से वो कुछ नहीं बोल पाता था| और ना बोलने की वजह से कई बार उसका पेट भी बहुत दर्द रहता था| एक दिन वो पेट दर्द की वजह से कराह रहा था, तभी उसे देखकर चांदनी कबूतर काजल कोयल से बोली, “काजल, हमने कालिया के साथ अच्छा नहीं किया”| ये सुनकर काजल को भी अपनी किए पर पछतावा हुआ| वो बोली, ”तुम सही कह रही हो| हमें झूठ बोलकर कालिया को चुप नहीं करना चाहिए था| शायद वो ऐसा ही है| शायद ज़्यादा बोलना ही उसकी सेहत का राज है”| 

ये कहकर वो दोनों फिर से शेर की गुफा में गए| पहले की तरह शेर अपनी गुफा के बाहर सो रहा था| काजल गुफा में से एक शाही कागज और कलम ले आई. फिर,पहले की तरह काजल ने कालिया के लिए चिठ्ठी लिखी और वो दोनों उड़कर कालिया के पास गए| और काजल बोली, ”कालिया, महाराज ने तुम्हारे लिए एक और चिठ्ठी भेजी है”|ये सुनकर कालिया बहुत घबरा गया|  उसने सिर हिलाकर चिठ्ठी लेने से मना कर दिया| ये देखकर चांदनी बोली, “चलो, मैं तुम्हारे लिए ये चिठ्ठी पढ़ देती हूँ”| ये बोलकर चांदनी जोर से चिठ्ठी पढ़ने लगी, “कालिया, मुझे लगता है मुझसे बहुत बड़ी भूल गई| तुम भी हमारे जैसे ही हो| जैसे हमें कम बोलना पसंद है, वैसे ही तुम्हें ज्यादा बोलना पसंद है| इसलिए मुझे तुम्हें ना बोलने का दंड नहीं देना चाहिए था| मैं तुमसे माफ़ी मांगता हूँ, और तुम्हें दिया दंड वापिस लेता हूँ| अब से तुम जितना चाहे बोल सकते हो!”

ये सुनकर कालिया बहुत खुश हुआ| उसने एक लम्बी चैन की सांस ली और फिर बोला, “शुक्र है महाराज को समझ तो आई| मुझे तो लगा था ना अब कभी महाराज को समझ आएगी, और ना ही मैं कभी कुछ बोल पाऊंगा| और ऊपर से ये पेट दर्द तो मेरी जान ही निकाल देता| पता नहीं मेरे बोलने का मेरे पेट से क्या लेना-देना है| पर इतना तो ज़रूर है कि अगर मैं कुछ देर और चुप रहता तो मेरा पेट दर्द के मारे फट जाता! लेकिन शुक्र है हमारे मंदबुद्धि महाराज को समझ…”  
काजल बीच में टोकती हुई बोली,”अरे, कालिया| अब बस भी करो!” 

इस तरह कालिया एक बार फिर से बहुत ज़्यादा बोलने लगा और जंगल उसकी आवाज़ से गुंज उठा| 

शिक्षा:- जो जैसा है वैसा ही अच्छा है| इसलिए हमें किसी को बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए| 
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15 September 2018

जादुई अंगूठी

एक समय की बात है, दो बहनें जिनका नाम गुड्डू और चुटकी था, नदी के किनारे घूम रही थी दोनों जब घूमते - घूमते थक गयी तो वही एक पेड़ के निचे बैठ गयी। गुड्डू को किताबे पढ़ने का बहुत शौक था इसलिए वो वहा बैठकर अपनी किताब पढ़ने लगी और चुटकी खाली बैठी-बैठी बोर होने लगी, तो उसने सोचा की क्यों न फूलों की माला बनाई जाये और यह सोचकर चुटकी अपनी माला के लिए फूल चुनने चली गयी , तभी उसे वहा एक खरगोश दिखाई दिया , जिसे देखकर चुटकी सोचती हैं, “वाह ! कितना सुंदर  खरगोश हैं और इसके फर भी कितने सफेद और चमकदार हैं।” 

यह सोचते ही चुटकी उस खरगोश को पकड़ने के लिए उसके पीछे - पीछे भागने लगी। थोड़ी दूर जाके वो खरगोश एक बड़े गढढे में चला गया चुटकी भी वहां पहुँच गयी और जैसे ही चुटकी ने उसमे झाँककर देखा तो उसका पैर फिसल गया और वो फिसलकर गढढे में गिर गयी । वो उस गढढे में नीचे गिरती चली गयी और एक सूखी पातियो के ढेर पर जा गिरी जब वो उठके वहा चारो तरफ देखने लगी तो उसे वहा उन खरगोशो के बिल दिखाई दिए, चारो तरफ सुंदर - सुंदर  खरगोश देखकर वो बहुत खुश हुई और सबकुछ भूलकर उन खरगोशो के पीछे भागने लगी ।


कुछ समय बीत जाने के बाद अचानक चुटकी की नज़र वहा एक किनारे पर किसी अजीब सी चीज़ पर पड़ी। उसने उसके पास जाकर देखा तो उसे पता चला की वो एक लकड़ी का डिब्बा था, जो पूरी तरह बंद था और काफी पुराना भी लग रहा था। चुटकी उस डिब्बा को अलट- पलट कर देखने लगी और सोचा, “देखने में तो ये बहुत पुराना लग रहा है, लेकिन ये खुलेगा कैसे?” चुटकी यह सोच ही रही थी की अचानक एक बड़ा सा खूबसूरत नीली आँखों वाला खरगोश उसके सामने आ गया। जिसे देखकर चुटकी सबकुछ भूल गयी और उस डिब्बा को वही रख के उस खरगोश के पीछे - पीछे चल पड़ी।

कुछ दूर उस खरगोश के पीछे जाने के बाद चुटकी को एक अजीब सी आवाज़ सुनाई देने लगी, जैसे ही वो उस आवाज़ को ठीक से सुनने की कोशिश करने लगी तभी उसकी नज़र उस नीली आँखों वाले खरगोश पर पड़ी। वो यह देखकर हैरान रह गयी की वो आवाज़ और किसी की नहीं उसी खरगोश की थी, वह खरगोश बोल रहा था और वो चुटकी से बोला, “तुम कौन हो और तुम यहाँ कैसे आयी ?” यह सुनकर चुटकी बोली,  “अरे खरगोश जी ! आप बात कर सकते हैं ! लेकिन आप बोल कैसे सकते हैं ?”खरगोश ने कहा, “ये मै तुम्हें बाद मे बताऊंगा, पहले तुम बताओ की तुम कौन हो और तुम यहाँ कैसे आयी? वापस बाहर जाने के बारे में नहीं सोचा तुमने? अब तुम्हें यहाँ से वापस बाहर जाना चाहिए।

खरगोश की बात सुनके अब चुटकी को अपनी बहन गुड्डू की याद आने लगी और उसने सोचा की गुड्डू को उसकी फ़िक्र हो रही होगी और इतना सोचते ही वो उदास हो गयी और खरगोश से बोली, “खरगोश जी ! मुझे वापस जाने का रास्ता नहीं पता।”इसपर खरगोश ने कहा, “तुम जहाँ से आयी हो वहा से वापस नहीं जा सकती क्योंकि तुम उस सुरंग से ज़मीन के बहुत निचे आ गयी हो अब यहाँ से वापस जाने का एक ही रास्ता हैं।”

चुटकी ने पूछा, “कौन सा रास्ता ?”खरगोश ने कहा, ”जादुई अंगूठी।”यह सुनते ही चुटकी बहुत उत्सुक सी हो जाती है और बड़ी ही उत्सुकता से खरगोश से पूछती हैं, “जादुई अंगूठी ! कहाँ हैं वो, मुझे भी दिखाओ। इसपर खरगोश ने कहा, “वो एक पुराने लकड़ी के डिब्बा में रखी हैं, जिसे बहुत समय पहले एक बुरे इंसान ने बंद करके मिटटी में कही दफना दिया था जिस से वो किसी को न मिले और उसका दिया श्राप कभी नहीं टूटे।”

तभी चुटकी को वो डिब्बा याद आता हैं, जो उसने थोड़ी देर पहले देखा था, और वो बोलती हैं, “मेने अभी थोड़ी देर पहले वहा पीछे एक पुराना लकड़ी का डिब्बा देखा था, वो हर तरफ से बंद था और बहुत पुराना लग रहा था। खरगोश ने कहा, “मुझे वहा ले चलो।” खरगोश के यह बोलते ही चुटकी उसे वहा ले जाती हैं और उसे वो डिब्बा दिखाती हैं। उस डिब्बा को देखकर खरगोश बहुत खुश होता हैं और बोलता है, “इस डिब्बे को हम सभी बहुत समय से ढूंढ रहे हैं, यह तुम्हें कहा मिला ?”

चुटकी ने बोला, “ये तो मुझे यही कोने में रखा हुआ मिला।” चुटकी की यह बात सुनकर खरगोश अचंभित होकर बोला, “हम यहाँ इतने समय से रह रहे हैं, और सुबह - शाम इसी डिब्बे को ढूंढ़ते रहते थे, इसी के लिए हमने यह इतना गहरा बिल भी बनाया लेकिन हमें यह डिब्बा आज तक नहीं मिला तो तुम्हें यहाँ आते ही ये डिब्बा कैसे मिल गया।” यह सुनकर चुटकी ने कहा, “मुझे नहीं पता खरगोश जी, मुझे तो ये बीएस इधर कोने में पड़ा हुआ दिखा” इसपर खरगोश ने थोड़ी देर सोचा तब उसे उस बुरे जादूगर की बात याद आयी की यह डिब्बा सिर्फ किसी नेकदिल इंसान को ही मिलेगा और तब वह बोलता है, “चुटकी तुम एक नेकदिल और भली लड़की हो शायद इसीलिए यह डिब्बा सिर्फ तुम्हें मिला। अब तुम इस डिब्बा को जल्दी से खोलो।”

चुटकी उस डिब्बा को खोलती हैं तो उसमे एक चमकदार अंगूठी दिखती हैं। उस अंगूठी को देखते ही खरगोश बोलता है, “चुटकी अब जल्दी से इस अंगूठी को अपने हाथ में पहन लो और पहनते ही सबसे पहले “श्राप टुटा” शब्द बोलना” चुटकी ने पूछा, “लेकिन यही क्यों ?”क्योंकि इस से हम सब यहाँ से बाहर निकल जायेंगे। यह सुनकर चुटकी जल्दी से उस अंगूठी को पहन लेती हैं और “श्राप टुटा” शब्द बोलते ही एक तेज़ रौशनी होती हैं चुटकी की आँखे बंद हो जाती हैं, और फिर जब आँखे खुलती है तो चुटकी उस बिल में से बाहर होती हैं और उसके आस - पास बहुत से लोग होते हैं। जिन्हे देखकर चुटकी पूछती है, “आप सब कौन हैं ?” 

तभी उनमे से एक नीली आँखों वाला आदमी बोलता है, “चुटकी में वही खरगोश हूँ, जिसके साथ अभी तुम अंदर बातें कर रही थी।”इस पर चुटकी हैरान होकर बोलती है, “अच्छा तो तुम इस श्राप की बात कर रहे थे, तुम असलियत में खरगोश नहीं इंसान हो।”

यह सुनकर नीली आँखों वाला आदमी कहता, “हाँ, कुछ समय पहले एक बुरे जादूगर ने हमसे हमारी ज़मीन, घर और गाँव को छीनने के लिए और हमारे पुरे गाँव को अपने बुरे जादू का घर बनाने के लिए, हम सबको अपने जादू से खरगोश बना दिया और हमें श्राप दिया की हम दिन में सिर्फ आधे घंटे के लिए इंसानी रूप में आ सकते हैं, और फिर कुछ समय बाद मरते हुए अपनी सारी शक्तियाँ इस एक अंगूठी में डालकर इसे यहाँ छिपा गया था, इसीलिए इसे ढूंढ़ने के लिए हम सभी ने यहाँ अपना बिल बनाया था और उस आधे घंटे में जब हम इंसान बन सकते थे तब इस डिब्बे को ढूंढ़ते थे और उसके बाद खरगोश बनके भी हम इसी काम में लगे रहते थे इसीलिए ज्यादातर हम इस बिल में ही रहते थे जिससे की हम इस डिब्बे को ढूंढ पाए, पर इतने समय से इतना ढूंढ़ने पर भी हमें यह डिब्बा नहीं मिला था लेकिन आज तुम आयी और तुम्हें ये डिब्बा मिल गया, तुमने हमारी बहुत मदद की चुटकी। तुम्हारा बहुत धन्यवाद।”

इसके बाद चुटकी वो जादुई अंगूठी उन लोगो को वापस कर रही होती हैं कि तभी वो नीली आँखों वाला आदमी बोलता है, “नहीं चुटकी तुम्हें ये अंगूठी वापस करने की जरुरत नहीं हैं क्योंकि अब इस अंगूठी का जादू खत्म हो गया हैं और अब ये साधारण अंगूठी बन गयी हैं, तुम इसे हमारी तरफ से एक तोहफा समझ कर रख सकती हो। उस आदमी की यह बात सुनके चुटकी बहुत खुश हो जाती हैं और उस अंगूठी को वापस पहन लेती हैं और उन सब से विदा लेकर वापस अपनी बहन के पास चली जाती हैं।

शिक्षा- बुराई का अंत निश्चित है |
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13 September 2018

नैतिक कहानियाँ - जादुई जूते

बहुत समय पहले की बात हैं किसी गाँव में एक छोटी सी लड़की रहती थी जिसका नाम पिंकी था। वह बहुत ही बुद्धिमान और मेहनती लड़की थी। वह हमेशा अपने मम्मी पापा की उनके काम में मदद करती थी। 

एक दिन की बात है, पिंकी घर में अकेली थी, तभी एक साधू आते है, उन्हें देखकर पिंकी पूछती है, “आप कौन हो?”
साधू कहते है, “बेटी! मै एक साधू हूँ, और काफी दिनों से भूखा हूँ , क्या कुछ खाने को मिलेगा ?” “जी जरूर बाबा” यह कहकर पिंकी साधू के लिए खाना ले कर आती है। खाना खा कर साधू बहुत खुश होते है और कहते है, “मै तुम्हारी सेवा से बहुत खुश हूँ, इसलिए मै तुम्हे एक उपहार देना चाहता हूँ।”

साधू अपना एक हाथ आगे बढ़ाते है और तेज़ रोशनी के साथ उनके हाथ में एक जोड़ी जूते आ जाते है। जूतों को पिंकी की तरफ बढ़ाते हुए वह कहते है, “ये लो बेटी तुम्हारा उपहार।” पिंकी जूतों को ले लेती है और कहती है, “जूते!” यह देखकर साधू पिंकी से कहते है, “बेटी! ये कोई साधारण जूते नहीं हैं, ये जादुई जूते हैं। इन्हें पहनकर तुम जितने कदम कदम चलोगी तुम्हे उतने ही सोने के सिक्के मिलेगे।”


यह सुनकर पिंकी ख़ुशी से बोलती है, “वाह , ये तो बहुत अच्छा है।” तभी साधू कहते है, “लेकिन एक बात का ख्याल रखना की तुम जितने कदम चलोगी तुम्हारी लम्बाई उतनी ही छोटी होती जायेगी और फिर जितने कदम तुमने चले होंगे उतने ही दिनों बाद वापस ठीक हो जाएगी, इसीलिए जब भी इन जूतों को पहनकर जितने भी कदम चलो फिर दोबारा इन जूतों को उतने ही दिनों के बाद इस्तेमाल करना।”

पिंकी को यह बात समझाकर साधू वहा से चले जाते है और  पिंकी अपनी चमकती आँखों से उन जूतों को निहारती रहती हैं। पिंकी के मन में लालच आ जाता हैं और वह सोचती हैं, “अगर मै इन जूतों को पहनकर पुरे घर में घूमू तो मेरे पास कितने सारे सोने के सिक्के हो जायेंगे।” यह सोचकर पिंकी अपने कमरे में जाती हैं। और उन जादुई जूतों को पहन लेती हैं और चार कदम चलती हैं, तभी उसे साधू की बात याद आती हैं की जितने कदम चलोगे उतनी ही लम्बाई छोटी हो जायेगी, लेकिन फिर भी पिंकी सोचती है, “लम्बाई तो मेरी अभी बहुत बढ़ेगी तो अभी थोड़ी छोटी होने से क्या फरक पड़ता है।”

यह सोचकर पिंकी उन जूतों को पहनकर अपने सारे कमरे में घूमने लगती है और काफी देर तक ऐसे ही घूमती रहती है, अब जब थोड़ी देर बाद पिंकी घूमते - घूमते थक जाती है तो वो रूकती हैं और सोचती है की, “बहुत देर से घूम रही हूँ और सोने के सिक्के भी बहुत सारे हो गये है अब थोड़ी देर आराम कर लेती हूँ।

यह सोचकर जैसे ही पिंकी अपने बिस्तर की तरफ बढ़ती है तो वह देखती है की अब वो उस तक नहीं पहुँच सकती क्योंकि अब वह एक चूहे जितनी छोटी हो गयी होती है और उसका बिस्तर अब उसके लिये बहुत बड़ा हो गया होता है। अब पिंकी बहुत पछताती हैं और तेज - तेज रोने लगती है उसे अब अपनी गलती महसूस होती है, लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था।

अगले दिन जब पिंकी के मम्मी - पापा घर वापस आते है तो वह पिंकी को घर में हर तरफ ढूंढ़ते है लेकिन पिंकी उन्हें कहीं भी नज़र नहीं आती, तब वह दोनों पिंकी के कमरे में जाते है तो उन्हें वहा ढेर सारे सोने के सिक्के नज़र आते है इसके अलावा उन्हें वहा कोई भी नज़र नहीं आता, तभी उन्हें पिंकी के रोने की आवाज आती है लेकिन पिंकी कही नजर नहीं आती पिंकी के मम्मी-पापा उसे कमरे  के हर कोने में ध्यान से ढूंढ़ने लगते है।

थोड़ी देर ढूंढ़ने के बाद मम्मी-पापा को पिंकी कमरे में एक कोने में बैठकर रोती हुई दिखाई देती है जिसे देखकर वह दोनों हैरान रह जाते है और उसे वहा से उठाकर अपने साथ ले जाते है और अपनी बेटी को ऐसे देखकर बहुत दुखी होते है। इसके बाद पिंकी उन्हें सारी बात बताती है, सारी बात सुनकर उसके पापा उसे समझाते है की लालच करना बहुत बुरी बात है | पिंकी को अब समझ में आ जाती है की लालच हमेशा हानि ही पहुचता है |

फिर पिंकी के मम्मी  और पापा उस साधू को ढूंढ लेते है जिसने ये जादुई जूते पिंकी को दिये थे, साधू ने पिंकी को ठीक करने का उपाय बताया कि इन जूतों को अलग-अलग किसी नदी मैं प्रवाहित करने से इनका जादू समाप्त हो जाएगा और पिंकी पहले जैसी हो जाएगी पर उनसे मिले सोने के सिक्के आप लोग रख सकते हो जिससे आपकी गरीबी ठीक हो जाएगी। अगले दिन ही पिंकी अपने मम्मी-पापा के साथ जाकर उन जूतों को नदी में फेंक देती है। 

शिक्षा- हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए।
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8 September 2018

जादुई पतीला

किसी गाँव में एक गरीब मज़दूर रहता था। मज़दूर एक जमींदार के यहाँ खेती का काम करता था, जिसका उसे बहुत कम मेहनताना मिलता था। ऐसी ही गरीबी में उसका जीवन बीत रहा था। एक दिन वो खेत में बीज़ बोने के लिए फावड़े से खुदाई कर रहा था। तभी उसे फावड़े के किसी धातु से टकराने की आवाज़ सुनाई दी। यह सुनकर मज़दूर बोला, “ ये आवाज़ कैसी है?”

उसने ज़मीन की तरफ देखा तो उसे पीतल का टुकड़ा ज़मीन में गड़ा दिखाई दिया।और वो पीतल के टुकड़े के आसपास ज़ोर-ज़ोर से फावड़ा मारने लगा। बहुत देर तक उस छोटे से टुकड़े के आसपास खुदाई करने पर भी उसे उस टुकड़े का अंत नहीं मिला। वो जितनी ज़्यादा खुदाई करता जा रहा था, वो टुकड़ा उतना ही बड़ा होता जा रहा था। अंत में जब उसने ज़मीन का एक बहुत बड़ा हिस्सा खोद डाला, तब उसे उस टुकड़े का अंत मिला। ये कोई कीमती चीज़ नहीं बल्कि खाना बनाने का एक बहुत बड़ा पतीला था, जिसमें एक साथ सौ लोगों का खाना बनाया जा सकता था। मज़दूर ने ये देखा तो वो बहुत निराश हुआ।


उसने अपना फावड़ा पतीले में फेंका और थोड़ी दूर पेड़ की छाया में बैठ गया।और वो वहीं पेड़ के नीचे सो गया। कुछ देर बाद जब वो जागा तो अपना फावड़ा लेने के लिए वो उस पतीले के पास गया। लेकिन जैसे ही उसने पतीले के अंदर देखा वो हैरान रह गया। पतीले के अंदर एक नहीं कई सारे फावड़े थे। उसने आसपास देखा तो उसे कोई दिखाई नहीं दिया।

तभी उसे एक तरकीब सूझी। उसने सारे फावड़े पतीले में गिन कर निकाले, और फिर उनमें एक फावड़ा उठाया और उस पतीले में डाल दिया। फावड़ा डालते ही वो एक से सौ हो गए।ये देखते ही मज़दूर समझ गया कि ये एक जादुई पतीला है, जिसमें कुछ डाला जाए तो वो सौ गुना हो जाता है। वो उस पतीले को अपने घर ले आया। कुछ दिनों बाद उसने जमींदार के यहाँ काम करना भी बंद कर दिया था।

अब वो रोज उस जादुई पतीले में एक फावड़ा डालता और उसके सौ हो जाने पर उसे बाज़ार में बेच आता। ऐसे कुछ ही दिनों में उसकी गरीबी दूर हो गई और वो बहुत अमीर हो गया। एक दिन जमींदार को उस पतीले के बारे में पता चला, तो वो मज़दूर के घर गया और बोला, “सुनो मज़दूर, मेरा जादुई पतीला मुझे वापिस दे दो। ये पतीला तुम्हें मेरे खेत में खुदाई करते वक़्त मिला था, इसलिए ये मेरा हुआ।” उसने मज़दूर को धक्का देकर गिरा दिया और वो पतीला ले लिया।

अब जमींदार उस पतीले की मदद से अपनी सभी कीमती चीजों को सौ गुना करने लगा। उसने अपने सभी हीरे-जवाहरातों को सौ गुना कर लिया।पर जैसे जमींदार को उस मज़दूर के बारे में पता चला था, वैसे ही वहाँ के राजा को उस जमींदार के बारे में पता चल गया। और वो कुछ सैनिक लेकर जमींदार के घर पहुंचा और कहा, “जमींदार, ये जादुई पतीला इस राज्य की ज़मीन से निकला है, और इस राज्य की हर वस्तु पर मेरा अधिकार है। इसलिए ये पतीला भी मेरा हुआ।”उसने जमींदार को धक्का देकर गिरा दिया और पतीला लेकर अपने महल लौट आया।

राजा मज़दूर और जमींदार से भी ज़्यादा लालची था। उसने अपने सैनिकों से कहकर पहले महल के सभी हीरे-जवाहरातों को सौ गुना किया और फिर उस सौ गुना हीरे-जवाहरातों को भी सौ गुना कर लिया। अब उसके पास हीरे-जवाहरातों का बहुत बड़ा भंडार हो गया।

एक दिन राजा जादुई पतीले के पास खड़ा उसे देख रहा था तभी उसे ख्याल आया और वो बोला , “देखने में तो ये एकदम साधारण पीतल का पतीला लगता है। फिर इसमें ऐसा क्या है जो इसे जादुई बनाता है? मुझे पता लगाना चाहिए। हो सकता है मुझे किसी ऐसे रहस्य का पता चले जिससे मैं और भी धनवान हो जाऊँ। मुझे इस पतीले की जांच करनी चाहिए। “

ये सोचकर उसका चेहरा चमकने लगा। और वो उस पतीले में कूद गया। वो पतीले में हाथ मारकर और उँगलियों से कुरेदकर उसकी जांच करने लगा। पर उसे पतीले में ऐसा कुछ भी खास नहीं दिखा।तभी अचानक उस पतीले से एक के बाद एक राजा के हम शक्ल राजा निकलने लगे। राजा ये देखकर बहुत हैरान हुआ। तभी उसे याद आया की यह एक जादुई पतीला है। जब पतीले में जगह कम पड़ने लगी तो सभी राजा उस पतीले से निकल कर बाहर खड़े हो गए। असली राजा भी पतीले से बाहर आया और बोलने लगा, “ मैं इस राज्य का राजा हूँ, इसलिए पर सभी हम शक्ल राजा उसकी बात को अन सुना कर राजसिंहासन की तरह बढ़ने लगे। असली राजा ने ये देखा तो उसे बहुत चिंता हुई, वो दौड़ कर अपने सिंहासन पर बैठ गया और बोला, “ तुम सभी पतीले के जादू से निकले मेरे हम शक्ल हो! मैं असली राजा हूँ, इसलिए ये सिंहासन मेरा है!” लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं मानी और एक के बाद एक सभी सौ राजा सिंहासन पर अपना हक़ जताने लगे।

कुछ देर बाद सभी गुस्सा हो गए और उन्होने तलवार निकाल ली।और सभी राजाओं के बीच युद्ध छिड़ गया। सभी सिंहासन के लिए एक दूसरे को मारने लगे। बहुत घमासान युद्ध चला, और अंत में असली राजा समेत सभी सौ राजा सिंहासन के लालच में मारे गए और उसी बीच पतीला भी टूट गया।

शिक्षा- हमें हमेशा लालच से दूर रहना चाहिए।

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3 September 2018

रोचक कहानियाँ - सलीम और भिखारी


किसी गांव में सलीम नाम का एक मछुआरा रहता था। सलीम रोज सुबह मछली पकड़ने के लिए समुन्दर के किनारे जाता था और शाम को उन मछलियों को बाजार में बेचकर वो अपना घर चलाता था। एक दिन वो मछलियाँ बाजार में बेचकर अपने घर लौट रहा था तभी उसे रास्ते में एक भिखारी मिला। भिखारी ने उससे कहा, “साहब कुछ पैसे दे दो। मैंने बहुत दिनों से कुछ नहीं खाया।”

सलीम बहुत बड़े दिल का था। वो किसी का दुःख नहीं देख पाता था। इसलिए उसने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और उसे दे दिए। अगले दिन जब सलीम बाजार से लौट रहा था, तब वो भिखारी उसे फिर मिला। सलीम ने उसे फिर से कुछ पैसे दे दिए। ऐसे ही बहुत दिनों तक चलता रहा।


रोज शाम को भिखारी सलीम को मिलता और सलीम उसे कुछ पैसे दे देता। एक दिन जब सलीम मछलियाँ बेचकर बाजार से लौट रहा था तो वो भिखारी उसे फिर मिला। हमेशा की तरह सलीम ने उसे पैसे दे दिए और वो आगे चल दिया, कुछ कदम चलने पर वो सोचने लगा, “मैं रोज इस भिखारी को खाने के लिए पैसे देता हूँ लेकिन इससे इसकी हालात में कोई सुधार नहीं हुआ। मुझे इसे कुछ और देना चाहिए।

ये सोचकर वो वापिस उस भिखारी के पास गया और बोला, ”सुनो भाई जान, तुम कल समुन्दर के किनारे आना। मैं तुम्हें एक बड़ा इनाम देना चाहता हूँ।

अगले दिन जब सलीम समुन्दर के किनारे मछली पकड़ने पहुंचा तो उसने देखा कि वो भिखारी पहले से ही वहाँ उसका इंतज़ार कर रहा था। सलीम को देखते ही भिखारी बोला, “साहब मैं आ गया। दीजिए आप मुझे कौन सा बड़ा इनाम देना चाहते थे|

यह सुनकर सलीम ने कहा, “मैं तुम्हें एक बहुत बड़ा इनाम दूँगा। लेकिन उसके लिए तुम्हें समुन्दर से मेरे लिए कुछ मछलियाँ पकड़नी होगी।” भिखारी ये सुनकर बहुत निराश हुआ। उसे ये बात बिलकुल पसंद नहीं आई। लेकिन फिर वो सलीम की बात मान गया।

वो दोनों नाव में बैठ गए। और नाव का चप्पू चलाते हुए समुन्दर में बहुत आगे निकल आए। सलीम ने नाव रोक कर भिखारी से बोला, ”चलो, अब तुम इस जाल को समुंदर में फेंक कर मेरे लिए मछलियाँ पकड़ो!

भिखारी ने जाल उठाया और वैसे का वैसे उसे समुन्दर में फेंक दिया। सलीम ये देखकर उससे बोला, “ये तुमने क्या किया?”

भिखारी ने कहा, “आपने ही मुझे जाल समुन्दर में फेंकने के लिए कहा था।”

मैंने तुम्हें मछली पकड़ने के लिए जाल समुन्दर में फेंकने के लिए कहा था! इस तरह से नहीं! रुको, मैं तुम्हें दिखाता हूँ समुन्दर में जाल कैसे फेंकते हैं। ठीक से देखो। ऐसा कहकर सलीम ने जाल समुन्दर से खींचा। और फिर एक अच्छे मछुआरे की तरह जाल फैला कर समुन्दर में फेंका। पर इससे पहले कोई मछली उसमे फँस पाती उसने जल्दी से जाल खींच लिया।

ये देखकर भिखारी बोला, “अरे! ये आपने क्या किया? आपने जाल खींच क्यों लिया?”

सलीम ने कहा, “मेरे वादे के अनुसार आज तुम मछलियाँ पकड़ोगे, तभी मैं तुम्हें बड़ा इनाम दूँगा। अब जल्दी से जाल को ठीक से समुन्दर में फेंको।”

भिखारी ने जाल समेट कर समुन्दर में फेंका। लेकिन वो जाल ठीक से नहीं फेंक सका। ऐसे ही उसने बहुत बार कोशिश की। और आखिरकार उसे जाल ठीक से फेंकना आ गया। अब वो दोनों मछलियों के जाल में फंसने का इंतज़ार करने लगे। काफी देर तक कोई मछली जाल में नहीं फंसी। इससे निराश होकर भूख से तड़पता हुआ भिखारी बोला, “इससे अच्छा तो आप मुझे खाने के लिए थोड़े बहुत पैसे ही दे देते। मैं कहाँ आपके बड़े इनाम के चक्कर में फँस गया?”

निराश भिखारी पेट पकड़कर बैठ गया। ऐसे ही वो दोनों बहुत देर तक बैठे रहे। आखिरकार उनके जाल में कुछ हलचल हुई। उन दोनों ने गौर से देखा तो जाल में बहुत सारी मछलियाँ फँसी हुई थी।

और उन दोनों ने नाव जाल में खींच लिया। जाल में बहुत सारी मछलियाँ फंसी थी। इतनी सारी मछलियाँ देखकर भिखारी बहुत खुश हुआ। वो सलीम से बोला, “मैंने आपके लिए मछलियाँ पकड़ दी! अब अपने वादे के अनुसार आप मुझे एक बड़ा इनाम दीजिए!”

ये सुनकर सलीम बहुत प्यार से बोला, “तुम्हें तुम्हारा इनाम मिल चुका है” भिखारी हैरान होकर बोला, “कब? आपने मुझे कोई इनाम नहीं दिया!”

यह सुनकर सलीम बोला, “भाई जान, मैंने आपको मछली पकड़ना सिखा दिया। अब आपको किसी इनाम की, या किसी से कुछ मांगने की ज़रुरत नहीं है। अब आप रोज मछलियाँ पकड़कर, उन्हें बाजार में बेचकर इज़्ज़त की ज़िंदगी जी सकते हो।”

भिखारी को सलीम की सीख समझ आ गई। वो सलीम से बोला, “आप सही कह रहे हैं। मुझे मेरा इनाम मिल चुका है। अब मैं खुद मछली पकड़कर इज़्ज़त से अपना घर चला सकता हूँ।”

इस तरह भिखारी ने भीख माँगना छोड़ दिया और वो मछली पकड़कर अपना घर चलाने लगा।

शिक्षा- परिश्रम से कोई भी व्यक्ति अपना भाग्य बदल सकता है|

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