Wednesday, 29 November 2017

पंचतंत्र की कहानी - शेर और गीदड़



एक शेर और शेरनी अपने दो शावकों के साथ वन में रहते थे। दोनों में बहुत प्रेम था। शेर, शेरनी के लिए शिकार लेकर आता था और वह मिल-बाँट कर खा लेते  थे। एक दिन शेर को जंगल में शिकार के लिए कुछ भी नहीं मिला। जब वह वापिस अपने घर की ओर आ रहा था तो उसे गीदड़ का एक बच्चा नजर आया। इतने छोटे बच्चे को देखकर शेर को दया आ गई। उसे मारने के बजाए वह उसे अपने दांतो से पकड़कर गुफा में ले आया। गीदड़ के बच्चे को देखकर शेरनी को भी दया आ गई और वह अपने दोनों बच्चो के साथ उसे भी पालने लगी। 

तीनों बच्चे साथ खेलते-कूदते बड़े होने लगे। शेर के बच्चों को ये नहीं पता था की उनका तीसरा भाई एक गीदड़ है, शेर नहीं। एक दिन जब तीनों जंगल में घूम रहे थे, तो उन्हें हाथियों का एक झुण्ड नजर आया। हाथियों को देखकर गीदड़ ने अपने शेर भाइयों से कहा, “ये हाथी हमसे बहुत ही ताक़तवर हैं। हमें इनसे नहीं लड़ना चाहिए।” गीदड़ की ये बातें सुनकर उसके दोनों भाई जोर-जोर से हँसने लगे। गीदड़ को बहुत गुस्सा आया लेकिन वह कुछ नहीं कह पाया। घर आते समय, उसके दोनों भाई उसका रास्ते भर मजाक उड़ाते रहे। 

घर आकर गीदड़ ने सारी बात शेरनी को बताई, “माँ, आप इन्हें समझा लो। ये पुरे रास्ते भर मेरा मजाक उड़ाते आए हैं। अगर मुझे गुस्सा आ गया तो मैं इन्हें मार भी सकता हूँ।” गीदड़ की बात सुनकर शेरनी के दोनों बच्चों ने उसे हाथी से डरकर भागने की बात बताई और कहा की गीदड़ ना खुद आगे गया और ना उन्हें जाने दिया। ये सब बातें सुनकर शेरनी ने गीदड़ को समझाया, “बेटा, ये तुम्हारे छोटे भाई हैं। इन्हें माफ करना ही तुम्हारा फ़र्ज़ है। तुम इनसे बड़े हो और बड़ो का फर्ज छोटों को माफ़ करना होता है, तभी तो वो तुम्हें इज्ज़त देंगे।"

शेरनी की बातें सुनकर भी गीदड़ को तसल्ली नहीं होती और वो फिर भी उसके बच्चों पर गुस्सा निकालता है। ये सब देखकर शेरनी को भी गुस्सा आ जाता है। तब शेरनी, गीदड़ को फिर से समझाती है – “तुम्हे सच्चाई का पता नहीं है कि तुम कौन हो और वो कौन हैं। तुम एक गीदड़ के कुल से हो और तुम्हारे उस कुल में हाथी को देखकर सब डर जाते हैं। तुमने वैसे ही किया हैं जैसा कि तुम्हारे कुल में किया जाता है। हमने तुम पर दया करके तुमको अपने बच्चे की तरह पाला। इसके पहले की तुम्हारी हकीकत उन दोनों को पता चले और वह तुम्हे मार डालें, तुम अपने कुल के सदस्यों के पास भाग जाओ।" यह सुनते ही गीदड़ वहाँ से भाग जाता है। 


सारांश - हमारी पहचान कभी भी बदली नहीं जा सकती। 


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