Wednesday, 22 November 2017

पंचतंत्र की कहानी - ऊँट और सियार


पुराने समय की बात है, एक जंगल में क्रूर सिंह नाम का शेर रहता था। वह अपने साथियों के प्रति बहुत वफादार था, लेकिन उसके आस पास रहने वाले जानवर चापलूस थे और उसे हमेशा भड़काते रहते थे। एक दिन जंगल में ऊँट आ जाता है। यह देखकर शेर,सियार से कहता है, “जाओ, पता लगाओ कि ये कौन सा जानवर है?! हमने पहले कभी ऐसा जानवर नहीं देखा।"

यह सुनकर चापलूस सियार, शेर को बताता है, "इस जानवर को ऊँट कहते हैं और यह रेगिस्तान का जहाज़ कहलाता है। क्यों न हम इसका शिकार कर लेते हैं? शेर, सियार की बात सुनकर कहता है, "यह हमारा अतिथि है। इसको मैं कैसे हानि पहुंचा सकता हूँ?! तुम इस ऊँट को मेरे पास लेकर आओ। क्या पता ये हमसे मदद मांगने आया हो!"

यह सुनकर सियार खिसया कर वहाँ से चला जाता है। वह ऊँट को शेर के पास ले आता है और बताता है, "महाराज, यह ऊँट अपने साथियों से बिछड़ गया है और रास्ता भटक कर जंगल में आ गया है।" तब ऊँट, शेर से विनम्रता पूर्वक कहता है, “प्रणाम महाराज। मैं आपको कभी भी शिकायत का मौका नहीं दूंगा और आपकी हर आज्ञा का पालन करूंगा। कृपया मुझे यहाँ रहने दीजिये।" शेर की आज्ञा के बाद ऊँट भी जंगल में ही रहने लग जाता है।

कुछ दिनों बाद शेर हाथियों के साथ झगड़े मैं घायल हो जाता है और शिकार करने में असमर्थ हो जाता है। उसके सारे नौकर और साथी भूखे रहने लगे। एक दिन शेर उन सभी को बुला कर उनसे कहता है, "मैं घायल होने के कारण शिकार करने में असमर्थ हूँ। तुम मेरे लिए शिकार ढूंड के ले आओ ताकि मैं उसका शिकार करके अपना और तुम्हारा पेट भर सकूं।"

जंगल के सभी जानवर शिकार की खोज में चले जाते है लेकिन सियार के मन में कुछ और ही चल रहा होता है। वो जंगल के सारे जानवरों को अपने साथ शामिल कर लेता है। फिर वह शेर के पास जाकर कहता है, "मालिक, हमने पूरा जंगल छान मारा लेकिन हमें ऐसा कोई जीव नहीं मिला जिसे हम आपका भोजन बना सकें। आप हमें ही खाकर अपनी भूख मिटा लें।"

ऊँट उन सब की ये बातें सुनकर सोचता है, “जब सब जानवर अपना फर्ज निभा रहे हैं तो क्योँ न मैं भी शेर के सामने चला जाऊं? वैसे भी शेर बहुत ही दयालू हैं। वह मुझे नहीं खाएंगे।" ऊँट, शेर से कहता है, “मालिक, आप सभी को इतनी परेशानी हुई है। आप सब मेरा शिकार कर लें और मुझे अपनी सेवा करने का मौका दें ताकि मैं आपका ऋण चूका सकूं।"

यह सुनकर शेर सोचता है, “वैसे तो यह मेरा अतिथि है लेकिन ये खुद ही मेरे पास आया तो क्यों न इसे ही खा लिया जाये?!"  ऊँट के कहते ही शेर और सियार उस पर झपटते हैं और उसे खा जाते हैं। इस तरह से उस निर्दोष ऊँट का चालाक सियार की चालाकी से अंत हो जाता है।

सारांश - “कभी भी किसी पर आँखे मुंद कर भरोसा नहीं करना चाहिए और किसी की सलाह पर अमल करने से पहले अपने विवेक से काम लेना चाहिए।"

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